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तुम्हारी क़सम...


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तुम भी सोचती होगी ना,
की क्या से क्या हो गया,
जो कभी नहीं सोचा था,
आज वो भी हो गया,
है ना...
अब क्या सोचती हो तुम,
क्या कोई नया ख़्वाब बुनती हो तुम,
नयी जगह टटोलती हो,
सपना देखती हो?
अतरंगी सा, सतरंगी सा,
मेरा?
क्यूँकि मैं तो रोज़ देखता हूँ,
रोज़ महसूस करता हूँ,
आस पास, हर जगह,
सच्ची.. तुम्हारी क़सम...
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