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गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा त्याग का महत्व बताया गया है उक्त में मानव जीवन में कुछ त्याग कर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
शरीर नाशवान है और उसे जाननेवाला शरीरी अविनाशी है – इस विवेक को महत्त्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना – इन दोनों मे से किसी भी एक उपाय को काम में लाने से चिंता –शोक मिट जाते है।
निष्काम भाव पूर्वक केवल दूसरो के हित के लिए अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करने मात्र से कल्याण हो जाता है ।
कर्म बंधन से छूटने के दो
उपाय है – कर्मो के तत्व को जानकर नि:स्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्व ज्ञान का अनुभव करना।
By sanganerkesariगीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा त्याग का महत्व बताया गया है उक्त में मानव जीवन में कुछ त्याग कर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
शरीर नाशवान है और उसे जाननेवाला शरीरी अविनाशी है – इस विवेक को महत्त्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना – इन दोनों मे से किसी भी एक उपाय को काम में लाने से चिंता –शोक मिट जाते है।
निष्काम भाव पूर्वक केवल दूसरो के हित के लिए अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करने मात्र से कल्याण हो जाता है ।
कर्म बंधन से छूटने के दो
उपाय है – कर्मो के तत्व को जानकर नि:स्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्व ज्ञान का अनुभव करना।