आखिर पड़ोसी होते,किसलिए है,सुख-दुःख बाँटने के लिए न ,आजकल तो देखिए पड़ोसी धर्म खत्म से हो गया हूं, सब कितने संवेदनहीन हो गए है,
मुझे तो खुशी है कि मैं आपका पड़ोसी हूँ ,अब देखिए न मैं रोज़ आपका अख़बार पढ़ता हूँ, पर क्या आपने कभी मुझे रोका, टोका,नहीँ न, यही तो है पड़ोसी धर्म