हर इंसान की जीवन यात्रा उसकी अपनी जीवन यात्रा है। किसी के पदचिन्हों पर चलकर क्या स्वयं की यात्रा पूरी हो सकती है। क्या दूसरों के द्वारा गढ़े गए रास्ते आपके अपने रास्ते हो सकते हैं? ऐसे ही एक रास्ते को अपना आदर्श मानकर अनुष्ठा ने उस पर चलने की कोशिश की है, देखें उसकी परिणति।