Pratidin Ek Kavita

Aao Jal Bhare Bartan Mein | Raghuvir Sahay


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आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहाय


आओ, जल-भरे बरतन में झाँकें

साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ


चौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगे

जैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओ


पैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगे

झुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपे


करती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना के

आओ जल-भरे बरतन में झाँके


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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio