Pratidin Ek Kavita

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By Nayi Dhara RadioArtsBooksFiction
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Pratidin Ek Kavita episodes

  • Zinda Rahein To Kya Hai | Muneer Niyazi

    ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी


    ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या। 

    दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या। 


    हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,

    एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या। 


    अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ,

    शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या। 


    दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र,

    दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या। 

    3 min
  • Nayi Sanskriti | Doodhnath Singh

    नई संस्कृति । दूधनाथ सिंह


    आसमान में बसा हुआ नगर

    निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर,


    आपस में टकराते, जूझते

    मकान।


    बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोचते व्यवसायी

    जूतों के तल्लों में सोना चिपकाए


    कंधों पर लादे—

    मसान।


    बेतहाशा भागती हुई भीड़

    अमर-बेलि की काली लतरों पर,


    और दुहरे चुटीले अँधेरे में गुँथे हुए

    पीली रोशनी के बियाबान।


    ढेर-सा सवेरा—अलकतरे से पुती किवाड़ों की

    फटी सनद में पिरोया-सा।


    भीतर एक गाए गए मौसम, एक वेगातुर धर्म,

    एक मर्यादित स्वार्थ की झूठी पहचान।


    शिशिर के बूढ़े पर्दे के पीछे

    ऋतुओं का एक ख़ाबगाह


    सभी जगह कत्थक या गरबा की अनगिन मदमाती मुद्राएँ

    और वसंत की ओस में नम एक सड़क का गुन-गुन गान।


    फिर बहुत दिन बाद

    नींव में मरी हुई


    निर्वसन हवा...

    टूटा हुआ नगर-कंकाल-आसमान।


    अमर बेलि की काली लतरों पर

    अँधेरी रोशनियों में उगते


    जंगली पेड़ों की तरह

    इंसान।

    4 min
  • Maun | Arti Abodh

    मौन । आरती अबोध


    अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने

    अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी

    जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था

    उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया

    और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।


    2 min
  • Prem Ke Baare Mein Ek Shabd Nahi | Viren Dangwal

    प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं । वीरेन डंगवाल


    शहद के बारे में

    मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा


    वह

    जो बहुश्रुत संकलन था

    सहस्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का


    जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव

    न जाने कब

    एक तर्जनी की पोर से

    चखी थी उसकी श्यानता

    गई नहीं अब भी वह

    काकु से तालु से

    जीभ के बीचों-बीच से

    आँखों की शीतलता में भी वही


    प्रेम के बारे में

    मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।

    2 min
  • Ghar Ek Muktibodh-Numa Kavita Hai | Kumar Divyanshu Shekhar

    घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है ।  कुमार दिव्यनशु शेखर

     

    कुल जमा चार लोग रहते हैं

    छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है

    घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।


    अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में 

    अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग

    जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!'


    एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है

    मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का

    हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है

    धुरी में भविष्य छुपकर बैठ जाता है।


    अलग-अलग अँधेरे हिस्सों में

    चहारदीवारी के बाहर 

    लटके हैं― नरभक्षियों के मुंड

    अपहरण करना चाहते हैं धुरी में छुपे भविष्य का।


    घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।

    मुझे डर है―

    वो लड़का जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है

    बन न जाए ब्रह्मराक्षस...


    3 min
  • Kharepan Ka Ehsaas | Kanhaiya Lal Nandan

    खारेपन का अहसास । कन्हैयालाल नंदन


    खारेपन का अहसास

    मुझे था पहले से

    पर विश्वासों का दोना

    सहसा बिछल गया

    कल,

    मेरा एक समंदर

    गहरा-गहरा सा

    मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।


    2 min
  • Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi

    खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी 


    नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से

    नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने

    सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा

    नए साल में हम खुट जाएँ

    खुट जाएँ मतलब..

    खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ

    ही ही हा हा ही हा

    अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते

    हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल से जबरिया हँसी को रोकती बोली

    क्यों खुटने से डरते हो ???

    हम तो रोज़ खुटते हैं…

    2 min
  • Ek Baar | Rajula Shah

    एक बार । राजुला शाह


    बह जाने देना

    उड़ जाने देना

    अपने आप को

    एक बार

    तुम भी।


    गुब्बारे-सा

    हवा के बुलबुले-सा

    हल्का होगा तुम्हारा मन

    और कहीं भी जा सकेगा

    बिला रोक-टोक

    फिर-

    प्रेम से इन्तज़ार में

    इन्तज़ार से

    मौन में

    मौन से

    निपट शून्य में

    और तुम्हें लगेगा,

    सबसे ताकतवर हो तुम

    ऊपर और ऊपर

    और ऊपर

    उठते हुए....


    2 min
  • Chandini | Ramvilas Sharma

    चाँदनी । रामविलास शर्मा


    चाँदी की झीनी चादर-सी

    फैली है वन पर चाँदनी।


    चाँदी का झूठा पानी है

    यह माह-पूस की चाँदनी।


    खेतों पर ओस-भरा कुहरा,

    कुहरे पर भीगी चाँदनी;


    आँखों में बादल-से आँसू,

    हँसती है उन पर चाँदनी।


    दु:ख की दनिया पर बुनती है

    माया के सपने चाँदनी।


    मीठी मुस्कान बिछाती है

    भीगी पलकों पर चाँदनी।


    लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख,

    सपनों-सी झूठी चाँदनी;


    लोहे से दु:ख को काटे क्या

    सपनों-सी मीठी चाँदनी।


    यह चाँद चुरा कर लाया है

    सूरज से अपनी चाँदनी।


    सूरज निकला, अब चाँद कहाँ?

    छिप गई लाज से चाँदनी।


    दु:ख और कर्म का यह जीवन,

    वह चार दिनों की चाँदनी।


    यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर,

    वह अंधकार की चाँदनी।


    3 min
  • Parcham | Kumar Ambuj

    परचम।  कुमार अम्बुज 


    वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला 

    कोई उसे छू भी नहीं रहा है 

    किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा 

    लेकिन देखो, वह खिला हुआ है


    बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए 

    एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में 

    आसपास की हर चीज़ इशारा करती है 

    तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू 

    दुर्दिनों के किनारे शब्द


    मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है 

    जैसे पेड़ की यह छाँह मंज़िल नहीं 

    यह समाज जो आख़िर एक दिन आज़ाद होगा 

    उसकी संभावना मरते हए आदमी की आँखों में है 

    और असफलता मृत्यु नहीं है 


    यह जीवन है, धोखेबाज़ पर भी मुझे विश्वास करना होगा 

    निराशाएँ अपनी गतिशीलता में आशाएँ हैं


    'मैं रोज़ परास्त होता हूँ'-

    इस बात के कम से कम बीस अर्थ हैं

    यों भी एक-दो अर्थ देकर 

    टिप्पणीकार काफ़ी कुछ नक़सान पहुँचा चुके हैं 

    गणनाएँ असंख्य को संख्या में न्यून करती चली जाती हैं


    सतह पर जो चमकता है वह परावर्तन है

    उसके नीचे कितना कुछ है अपार 

    शांत, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ।

    3 min

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के…