बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर । अरुण कुमार सिंह
तुम जागती करवटों से लिखते हो कोई नाम
सुबह चादर बूँद-बूँद निचोड़ती है अपनी पीड़ा
बहेलिए ने मारा फिर कैद की
एक चिड़िया
जिसके पेट में मिली थी प्रेम कविता
उसे क्रांति की कविता भी कहा गया।
जिस रात ठंड को याद कर चादर ओढ़ी थी,
गर्मी बहुत थी और हम पसीने से तरबतर।
ये कैसी त्रासदी जी रहे हैं हम,
पास बने रहने के लिए दूर जाना ज़रूरी
जिन रातों में कुछ नहीं लिखा तुमने
जीवन लिख रहा था तुम्हारे माथे पर अपनी कविता।
कोई किसी की पीठ पर सिर टिकाकर करता है प्रार्थना
कि उनके बीच का ईश्वर बचा रहे।
कितना कुछ छिपा रहता है शब्दों की चुप्पी के भीतर
किसी दिन झाडू लेकर बु्हार देंगे सारे शब्द
और बटोर लेंगे चुप्पी
किसी लिपिवादक को बुलाकर अनुवाद कराना उसका।
पलकों की सलवटों में सांप बसने लगें
तो ज़हरीली दिखती है दुनिया।
रक्षक बनने की प्रवृत्ति के दोषी हैं हम, सखी
क्या एक दिन ख़ुद ही के बनाए संकट में डालकर
एक दूसरे को बचाने का खेल खेलेंगे हम?
और हार जायेंगे सारी बाज़ी।
तुम्हारे ईश्वर की मूर्ति में दरार दिखेगी,
तो क्या अपने आंसुओं से भरोगे उसे?
सुनो, हारने से ठीक पहले रख देना
मेरे माथे पर अपना माथा
हम आखिरी प्रार्थना फिर करेंगे,
कि बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर।