Pratidin Ek Kavita

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By Nayi Dhara RadioArtsBooksFiction
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Pratidin Ek Kavita episodes

  • Aaj Mujhse Door Duniya | Harivansh Rai Bachchan

    आज मुझसे दूर दुनिया । हरिवंशराय बच्चन


    आज मुझसे दूर दुनिया!

    भावनाओं से विनिर्मित,


    कल्पनाओं से सुसज्जित,

    कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया!


    आज मुझसे दूर दुनिया!

    ‘बात पिछली भूल जाओ,


    दूसरी नगरी बसाओ’—

    प्रेमियों के प्रति रही है, हाय, कितनी क्रूर दुनिया!


    आज मुझसे दूर दुनिया!

    वह समझ मुझको न पाती,


    और मेरा दिल जलाती,

    है चिता की राख कर मैं माँगती सिंदूर दुनिया!


    आज मुझसे दूर दुनिया!

    2 min
  • Bhram | Sushma Kumari

    भ्रम ।  सुषमा कुमारी 


    आसमान में अब बादल नहीं दिखता

    दिखता है बादल के होने का एक भ्रम 

    पेड़ों पर अब चिड़ियाँ नहीं रहती

    रहता है उनके होने का एक भ्रम।

    फूर्लों पर अब मधुमक्खियाँ नहीं होतीं

    और सड़कों पर अब नहीं होते रास्ते!

    इसी तरह

    जंगल में अब जंगल नहीं बसता

    थाली में नहीं होती रोटी

    अख़बार में नहीं होता समाचार,

    जीवन में नहीं होता प्रेम!

    अब किसान की आत्मा में नहीं बची खेती

    युवाओं के आँखों में नहीं बचे सपने

    बच्चों के हा्थों में नहीं बचे खिलौने!

    देश में अब नहीं बचा देश

    आदमी में नहीं बचा थोड़ा-सा आदमी!

    हमारे-तुम्हारे परिदृश्य में

    इन दिनों बस बचा रह गया है

    सबके होने का एक भ्रम!


    हमारी-तुम्हारी कलाई पर बंधी घड़ी में

    नहीं बचा अच्छा या बुरा समय!

    हम विकास की दुनिया के

    अभिमंत्रित लोग हैं

    जिन्हें अपने ही परिदृश्य से

    गायब होती चीज़ें

    अब दिखाई नहीं देती!

    3 min
  • Main Duniya Ki Haqeeqat Jaanta Hun | Naqsh Lyallpuri

    मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी


    मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ

    किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ


    मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से

    मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ


    तेरी यादें हैं शब-बेदारियाँ हैं

    है आँखों को शिकायत जानता हूँ


    मैं रुस्वा हो गया हूँ शहर-भर में

    मगर किस की बदौलत जानता हूँ


    ग़ज़ल फूलों सी दिल सहराओं जैसा

    मैं अहल-ए-फ़न की हालत जानता हूँ


    तड़प कर और तड़पाएगी मुझ को

    शब-ए-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ


    सहर होने को है ऐसा लगे है

    मैं सूरज की सियासत जानता हूँ


    दिया है 'नक़्श' जो ग़म ज़िंदगी ने

    उसे मैं अपनी दौलत जानता हूँ

    3 min
  • Akoo (Main) | Khairul Anwar

    अकू | ख़ैरुल अनवर

    अनुवाद : जितेंद्र कुमार त्रिपाठी


    अगर मेरा अंतिम समय आ जाए तो


    मैं नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे दिलासा दे

    तुम भी नहीं


    मुझे उन आँसुओं की ज़रूरत नहीं

    मैं भेड़िया हूँ


    अपने झुंड से अलग

    चीरने दो गोलियों को मेरी चर्बी


    मैं फिर भी डटा रहूँगा

    घाव और विष दोनों ही


    संग-साथ लेकर

    दौड़ता रहूँगा


    जब तक यह चुभता दर्द जाता नहीं

    और किंचित ही परवाह किए बिना


    मैं जीना चाहता हूँ

    एक हज़ार साल और…


    (अकू : इंडोनेशियाई भाषा में—मैं)

    3 min
  • Barsaati Jhonka | Dharamvir Bharti

    बरसाती झोंका | धर्मवीर भारती


    चूमता आषाढ़ की पहली घटाओं को,


    झूमता आता मलय का एक झोंका सर्द;

    छेड़ता मन की मुँदी मासूम कलियों को


    और ख़ुशबू-सा बिखर जाता हृदय का दर्द!

    2 min
  • Sabhi Ped Ek Phool Hain | Anurag Tiwari

    सभी पेड़ इक फूल हैं।  अनुराग तिवारी 


    सभी पेड़ इक फूल हैं 

    जो प्रेम में दिए गए

    उपहार हैं।

    जिसे दिया होगा

    एक प्रेमिका के रूप में

    पृथ्वी ने

    हाथ बढ़ा कर

    अपने प्रेमी

    आकाश को!

    सभी नदियां इक लम्बा खत हैं

    जिसे लिखा होगा

    इस छोर की प्रेमिका ने

    उस छोर के प्रेमी को

    सुनो,

    जो तुम फूलों को काट रहे हो

    इस संवेदनहीन होती दुनिया में

    प्रेम के लिए बढ़े हाथ को

    काट रहे हो..

    कभी क्षमा नहीं किए जाओगे!


    2 min
  • Aisa Bhi Ho Sakta Hai | Balli Singh Cheema

    ऐसा भी हो सकता है |  बल्ली सिंह चीमा


    साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो, ऐसा भी हो सकता है,

    मरने वाला ही क़ातिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


    आज तुम्हारी मंज़िल हूँ मैं, मेरी मंज़िल और कोई,

    कल को अपनी इक मंज़िल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


    साहिल की चाहत है लेकिन, तैर रहा हूँ बीचों-बीच,

    मंझधारों में ही साहिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


    तेरे दिल की धडकन मुझको लगे है अपनी-अपनी-सी,

    तेरा दिल ही मेरा दिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


    जीवन भर भटका हूँ ‘बल्ली’, मंज़िल हाथ नहीं आई,

    मेरे पैरों में मंज़िल हो ऐसा भी हो सकता है ।


    3 min
  • Kya Wo Din Bhi Din Hain | Rahi Masoom Raza

    क्‍या वो दिन भी दिन हैं  | राही मासूम रज़ा


    क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए

    क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।


    हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं

    जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।


    इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन

    जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।


    हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही

    आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।


    2 min
  • Akanksha | Nandkishore Acharya

    आकाँक्षा । नंदकिशोर आचार्य


    एक अतीत रक्त की भाँति


    प्रवाहित रहता है मुझमें

    एक भविष्य ने साँसों की तरह


    बाँध रखा है मुझे

    और मैं - घड़ी को सुई -


    भविष्य के अतीत में बदलने की

    सूचना मात्र देता रह जाता हूँ।


    क्या कभी नहीं हो सकता यह

    एक पल के लिए ही सही


    अतीत और भविष्य

    मुझमें न मिल पाएँ


    और तब मैं

    मेरा सहारा लेने के लिए हाथ फैलाते


    भयभीत ईश्वर

    और मृत्यु को


    शून्य में छटपटाते हुए

    देख लूँ!


    2 min
  • Tum Sudhi Ban Bankar Baar Baar | Bhagwati Charan Verma

     

    तुम सुधि बन-बनकर बार-बार ।  भगवतीचरण वर्मा


    तुम सुधि बन-बनकर बार-बार

    क्यों कर जाती हो प्यार मुझे?

    फिर विस्मृति बन तन्मयता का

    दे जाती हो उपहार मुझे 

    मैं करके पीड़ा को विलीन

    पीड़ा में स्वियं विलीन हुआ

    अब असह बन गया देवि,

    तुम्हारी अनुकम्पा का भार मुझे 

    माना वह केवल सपना था,

    पर कितना सुन्दर सपना था

    जब मैं अपना था, और सुमुखि

    तुम अपनी थीं, जग अपना था 

    जिसको समझा था प्यार, वही 

    अधिकार बना पागलपन का

    अब मिटा रहा प्रतिपल,

    तिल-तिल, मेरा निर्मित संसार मुझे 


    3 min

About Pratidin Ek Kavita

From the publisher's feed

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के…