Pratidin Ek Kavita

Pratidin Ek Kavita

By Nayi Dhara RadioArtsBooksFiction
Download on the App Store

Pratidin Ek Kavita episodes

  • Gehri Raat Hai | Zeb Ghauri

    गहरी रात है ।  ज़ेब ग़ौरी


    गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत

    घर के दर-ओ-दीवार भी हैं कमज़ोर बहुत

    दर-ओ-दीवार: दरवाज़ा और दीवार


    तेरे सामने आते हुए घबराता हूँ

    लब पे तेरा इक़रार है दिल में चोर बहुत

    इक़रार: स्वीकार करना


    नक़्श कोई बाक़ी रह जाए मुश्किल है

    आज लहू की रवानी में है ज़ोर बहुत

    नक़्श: रेखाचित्र


    दिल के किसी कोने में पड़े होंगे अब भी

    एक खुला आकाश पतंगें डोर बहुत


    मुझ से बिछड़ कर होगा समुंदर भी बेचैन

    रात ढले तो करता होगा शोर बहुत


    आ के कभी वीरानी-ए-दिल का तमाशा कर

    इस जंगल में नाच रहे हैं मोर बहुत

    वीरानी-ए-दिल: मन के वीरान होने की अवस्था


    अपने बसेरे पंछी लौट न पाया 'ज़ेब'

    शाम घटा भी उट्ठी थी घनघोर बहुत


    3 min
  • Tadap Kar Jigar Munh Ko Aa Jaye Hai | Firaaq Gorakhpuri

    तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है । फ़िराक़ गोरखपुरी


    तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है


    उसे देख कर कब रहा जाए है

    किसू ने न अब तक बताया हमें


    ग़म-ए-हिज्र में क्या किया जाए है

    मोहब्बत में ऐ मौत ऐ ज़िंदगी


    जिया जाए है या मरा जाए है

    रुमूज़-ए-बहाराँ जो पूछो हो तुम


    गुल अपने लहू में नहा जाए है

    मुझे पा के तन्हा मिरी बेकसी


    सर-ए-शाम बिस्तर लगा जाए है

    मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़


    तिरे घर को हर रास्ता जाए है


    2 min
  • Dhat | Krishna Mohan Jha

    धत । कृष्णमोहन झा


    चाय-बिस्कुट-नमकीन

    धत

    चुटकुलों और निन्दाओं और नक़ली ठहाको

    धत

    होड़ लेती विनम्रताओं और खोखली सुंदरताओं

    धत

    राजनीतिक रूप से सही कविताओं 

    और पुरस्कार के लिए लार टपकाती जिह्वाओं

    धत

    बर्थडे-मैरेजडे-मदर्सडे-फ़ादर्सडे-चिल्ड्रेंसडे- टीचर्सडे-

    हेल्थडे-ड्रायडे आदि

    धत 

    महँगाई-भत्ता और इन्क्रीमेंट

    धत

     जीवनबीमा और मेडिकल इंश्योरेंस

    धत

     होमलोन-आरडी-जीपीएफ-पीपीएफ

    धत 

    शर्मा-वर्मा-कुमार- गुप्ता-मिश्रा चौहान- राव-रंजन-झा इत्यादि


    धत

    रेंगने-रिरियाने की भाषा

    धत एक कील में कब से ठुकी हुई

    मनुष्य होने की अन्तिम परिभाषा

    इन भाषाओं और परिभाषाओं को तोड़-फोड़कर

    अपने सारे कपड़े-लत्ते छोड़कर

    निष्कवच और निर्वस्त्र

    मैं निकल जाना चाहता हूँ एक ऐसी अन्तहीन यात्रा पर

    अपनी त्वचा तक उतार सकना शामिल हो जिसमें

    फिर मैं देखता हूँ

    वह कौन है जो आता है मेरे साथ

    और कौन रक्त से छलछलाते मेरे शरीर पर फेंकता है पत्थर


    3 min
  • O Chidiya | Aishwarya Tiwari

    ओ चिड़िया! ।  ऐश्वर्या तिवारी 


    ओ चिड़िया

    आ बैठ खिड़की पे

    मैं मरीज़ इस दुनियादारी का

    देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से

    आ बैठ संग मेरे

    बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर?

    क्या इतनी ही उलझन है उधर?

    मैं क़ैदी हूँ कितने बंधन का

    क्या जानूँ जिसे छू लूँ

    उलझ जाए वो भी दो-एक डोर में।

    दिल का बीमार हूँ इतना कि

    बाज़ार से ले आपा था पिंजरा,

    वो कहते हैं

    जिससे होता है प्रेम उसे रखते हैं संग हमेशा

    रखा है अब भी वो किसी कोने में

    जिसकी सलाखों पर लिखा है बाज़ारू भाषा में - प्रेम।

    आ बैठ तू फिर भी

    छोड़ तमाम दुनिया की भाषा-परिभाषा

    छोड़ यह पिंजरा-विंजरा

    मैं डाल दूंगा उसमें अपना जूता

    तू बता-

    कैसा है सब वहाँ

    जहाँ कहीं से आई है तू?


    आ मुझसे बतिया

    इसी बहाने अरसों से पड़ी बंद खिड़की खुल जाएगी

    फिर कौन है जो आकर यहाँ बैठेगी गाएगी

    आ मुझे तनिक प्रेम करने दे

    आ कि जीवन में जीवन रस भरने दे

    मैं नहीं कहता तेरा यही ठिकाना है

    आ कि तुझे एक दिन उड़ ही जाना है।


    3 min
  • Seedhi Si Baat | Pablo Neruda | Translation - Manglesh Dabral

    सीधी सी बात।  पाब्लो नेरुदा 

    (अनुवाद: मंगलेश डबराल) 


    शक्ति होती है मौन (पेड़ कहते हैं मुझसे)

    और गहराई भी (कहती हैं जड़ें)

    और पवित्रता भी (कहता है अन्न)

     

    पेड़ ने कभी नहीं कहा:

    ‘मैं सबसे ऊंचा हूँ!’


    जड़ ने कभी नहीं कहा:

    ‘मैं बेहद गहराई से आयी हूँ!’


    और रोटी कभी नहीं बोली:

    'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा'


    2 min
  • Drishya Aur Bimb | Rajesh Joshi

    दृश्य और बिम्ब। राजेश जोशी 


    एक सिनेमा घर के सामने छूटी हुई जगह में

    एक नए मॉडल की चमचमाती कार

    एक विकलांग बच्चे को डरा रही है

    कार धीरे धीरे आगे सरक रही है

    और डरता, घबराता, गिरता पड़ता

    उल्टे पाँव दौड़ने की कोशिश कर रहा है

    बच्चा

    ड्राइवर मुस्कुरा रहा है

    और आसपास खड़े तमाशबीन अंदर ही अंदर डर रहे हैं

    तरस खा रहे हैं

    पर हँस रहे हैं।

    यह एक दृश्य है

    जो हमारे समय के बिम्ब में बदल रहा है ।


    2 min
  • Gh Ra | Arun Kumar Singh

    घ र । अरुण कुमार सिंह 


    घर की याद में

    घर का स्पर्श है

    शब्दशः घ र

    घ

    र

    घ

    २

    बुदबुदाते हुए

    शरीर का स्पर्श करता हूँ

    रेखाएं खोजती रहती हैं

    रास्ता घर का

    रेखाएं अंधी हैं

    घर नहीं दिखता

    आजकल बहुत चलता हूँ

    खड़ा रहता हूँ

    दूर तक देखता हूँ 


    घ

    र

    सबके सामने कपड़ों के भीतर

    घ

    र

    नहीं टटोल पाता

    कायर शब्द गले में मिलता है

    उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ

    चुपके से ढूंढता हूँ 

    घ

    र 

    के बीच का हिस्सा


    2 min
  • Dastak | Gulzar

    दस्तक । गुलज़ार


    सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' 

    देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं


    आँखों से मानूस थे सारे

    चेहरे सारे सुने सुनाए


    पाँव धोए, हाथ धुलाए

    आँगन में आसन लगवाए


    और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए

    पोटली में मेहमान मिरे


    पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे

    आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था


    हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था

    और होंटों पर मीठे गुड़ का ज़ाइक़ा अब तक चिपक रहा था


    ख़्वाब था शायद!

    ख़्वाब ही होगा!!


    सरहद पर कल रात, सुना है चली, थी गोली

    सरहद पर कल रात, सुना है


    कुछ ख़्वाबों का ख़ून हुआ था


    2 min
  • Shraadh | Ashutosh Sharma

    श्राद्ध - आशुतोष शर्मा 


    किसी चींटी को बचपन में कुचला था

    केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता

    छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को

    किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या

    झूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह

    उपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल

    बहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां

    मारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर

    पत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना


    अग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म

    गंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़

    पीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्ण

    संस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पाप

    मृत्यु पर सिरहाने मेरे

    पंजे जूते चप्पल

    ककड़ पत्थर और छिपकलियां थी

    किन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थे

    चींटी बुलबुल केंचुए 

    भिखारी बस्ते उपेक्षित और झूले

    कुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएं

    किसी शास्त्रीय वर्जना के कारण

    जीते जी नहीं आ सकते शमशान

    उनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझ

    नहीं उठा सकती मेरी आत्मा।

    4 min
  • Ek Khwaish | Amrita Sinha

    एक ख्वाहिश । अमृता सिन्हा


    कभी कभी कुछ दूरियाँ अच्छी होती हैं,


    जैसे आँखों से काजल की दूरी

    कढ़ाही से करछी की दूरी

    लेखक की कलम से दूरी

    रचनाकार की रचनात्मकता से दूरी

    प्रेमी की प्रेम से दूरी


    अंतर्मन की गहराई में उतरने की ख़ातिर

    बाहरी दुनियाँ से दूरी, सोंशल मीडिया से अवकाश

    बाहरी कोलाहल से अलग-थलग


    बनायी जाये कुछ दिनों की दूरी

    रहा जाए एकदम ख़ामोश

    बनाया जाये चुप्पियों का पहाड़

    बिताया जाये कुछ दिन, मन की

    चंचल फुदकती

    गिलहरियों के साथ।


    सारी दुनियाँ की क़तर-व्योंत से दूर

    सिर्फ और सिर्फ मैं रहूँ

    और रहे

    सिर्फ़ अपना ख़्वाब।

    2 min

About Pratidin Ek Kavita

From the publisher's feed

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के…