Pratidin Ek Kavita

Baans | Kanhaiyalal Sethia


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बाँस | कन्हैयालाल सेठिया


स्वयं उगते

नहीं उगाए जाते

बाँस,

नहीं होते

उनके सुमन

कोई फल

नहीं उनमें

चंदन की सुवास,

पर बिना बाँस

नहीं बनती बाँसुरी,

ध्वनित होती है

जिसके छिद्रों से

राग रागिनियाँ

बिना उसके

नहीं बनती कलम

जिससे व्यक्त होती हैं

जीवन की अनुभूतियाँ

जो हैं अनमोल

वह बिकते हैं 

कौड़ियाँ के मोल


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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio