Pratidin Ek Kavita

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By Nayi Dhara RadioArtsBooksFiction
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Pratidin Ek Kavita episodes

  • Dushwari | Javed Akhtar

    दुश्वारी । जावेद अख़्तर


    मैं भूल जाऊँ तुम्हें


    अब यही मुनासिब है

    मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ


    कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो

    कोई ख़्वाब नहीं


    यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ

    कम-बख़्त


    भुला न पाया वो सिलसिला

    जो था ही नहीं


    वो इक ख़याल

    जो आवाज़ तक गया ही नहीं


    वो एक बात

    जो मैं कह नहीं सका तुम से


    वो एक रब्त

    जो हम में कभी रहा ही नहीं


    मुझे है याद वो सब

    जो कभी हुआ ही नहीं

    2 min
  • Hai Daiyya | Nilesh Raghuvanshi

    हाय दैया । नीलेश रघुवंशी 


    एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी

    कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए

    माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी बिंदी

    ओंठों पर लाली ठोड़ी पर सात टिकुली

    काली धोती के संग चटक हरे रंग का पोलका

    हाथ में गिलट के कड़े और बाजुबंद

    गले में हँसली बजट्टी माथे पर गिलट की बेड़ी लगाए

    कमर में करधौनी और पाँव में आयलें संग में आँवड़ा कड़ा भी

    स्त्री के सिर पर टोकरी

    टोकरी में फल हैं चमकदार और रंगीन

    सचमुच की फल बेचने वाली

    अगर इसे देख ले तो हँसेगी कितना

    हाय दैया हाय दैया करते हो जाएगी लोट-पोट

    अगर फलों की टोकरी लिए खड़ी हो जाए कोने में

    तो क्या लगेगी वह भी इतनी लुभावनी और इतनी ही सुंदर

    धत्-

    झटक देगी सर को और कहेगी इसको बनाने वाले की मति फिर गई है

    चौराहे पर मुझ जैसी कई हर दिन सिर पर टोकरी लिए बेचती हैं फल

    जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को

    भरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते

    आग लगे ससुरों की हँसी ठिठोली को

    मूँछोंबारों की मूँछें बर जाएँ हमीं को सजा लिए अपने घर में

    हाय दैया..


    3 min
  • Prem Ka Sparsh | Rabindranath Tagore | Translation - Hazari Prasad Dwivedi

    प्रेम का स्पर्श । रवींद्रनाथ टैगोर

    अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी


    हे भुवन,


    मैंने जब तक

    तुम्हें प्यार नहीं किया था


    तब तक तुम्हारा प्रकाश

    खोज-खोजकर (भी) अपना सारा धन नहीं पा सका था!


    उस समय तक

    समूचा आकाश


    हाथ में अपना दीप लिए हर सूनेपन में बाट जोह रहा था।

    मेरा प्रेम गान गाता हुआ आया,


    (फिर न जाने) क्या कानाफूसी हुई,

    उसने डाल दी तुम्हारे गले में


    अपने गले की माला!

    मुग्ध नयनों से हँसकर


    उसने तुम्हें

    चुपचाप कुछ दे दिया,


    (ऐसा-कुछ) जो तुम्हारे गोपन हृदय-पट पर

    चिरकाल तक बना रहेगा, तारा-हार में पिरोया हुआ!


    3 min
  • Ameeri Rekha | Kumar Ambuj

    अमीरी रेखा -  कुमार अम्बुज


    मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है

    और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ


    ऐसा होता आया है, बावजूद इसके

    कि कई चीज़ें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं


    और कई बार आदमी होने की शुरुआत

    एक आधी-अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा


    या एक पोखर बन जाने से भी होती है

    या जब सब रफ़्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरुआत है


    बशर्ते मनुष्यता में तुम्हारा विश्वास बाक़ी रह गया हो

    नमस्कार, हाथ मिलाना, मुस्कुराना, कहना कि मैं आपके


    क्या काम आ सकता हूँ—

    ये अभिनय की सहज भंगिमाएँ हैं और इनसे अब


    किसी को कोई ख़ुशी नहीं मिलती

    शब्दों के मानी इस तरह भी ख़त्म किए जाते हैं


    तब अपने को और अपनी भाषा को बचाने के लिए

    हो सकता है तुम्हें उस आदमी के पास जाना पड़े


    जो इस वक़्त नमक भी नहीं ख़रीद पा रहा है

    या घर की ही उस स्त्री के पास


    जो दिन रात काम करती है

    और जिसे आज भी मज़दूरी नहीं मिलती


    बाज़ार में तो तुम्हारी छाया भी नज़र नहीं आ सकती

    उसे दूसरी तरफ़ से आती रोशनी दबोच लेती है


    वसंत में तुम्हारी पत्तियाँ नहीं झरतीं

    एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है


    कि तुम नश्वर नहीं रहे

    तुम्हें यह देखने के लिए जीवित रहना पड़ सकता है


    कि सिर्फ़ अपनी जान बचाने की ख़ातिर

    तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो


    जब लोगों को रोटी भी नसीब नहीं

    और इसी वजह से साठ-सत्तर रुपए रोज़ पर तुम एक आदमी को


    और सौ-डेढ़ सौ रुपए रोज़ पर एक पूरे परिवार को ग़ुलाम बनाते हो

    और फिर रात की अगवानी में कुछ मदहोशी में सोचते हो


    कभी-कभी घोषणा भी करते हो—

    मैं अपनी मेहनत और क़ाबलियत से ही यहाँ तक पहुँचा हूँ।


    4 min
  • Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke | Shivmangal Singh Suman

    हम पंछी उन्मुक्त गगन के ।  शिवमंगल सिंह ‘सुमन’


    हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के

    पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,

    कनक-तीलियों से टकराकर

    पुलकित पंख टूट जाऍंगे।


    हम बहता जल पीनेवाले

    मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे,

    कहीं भली है कटुक निबोरी

    कनक-कटोरी की मैदा से,


    स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में

    अपनी गति, उड़ान सब भूले,

    बस सपनों में देख रहे हैं

    तरू की फुनगी पर के झूले।


    ऐसे थे अरमान कि उड़ते

    नील गगन की सीमा पाने,

    लाल किरण-सी चोंचखोल

    चुगते तारक-अनार के दाने।


    होती सीमाहीन क्षितिज से

    इन पंखों की होड़ा-होड़ी,

    या तो क्षितिज मिलन बन जाता

    या तनती साँसों की डोरी।


    नीड़ न दो, चाहे टहनी का

    आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो,

    लेकिन पंख दिए हैं, तो

    आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।


    3 min
  • Ma | Padma Sachdeva

    माँ । पद्मा सचदेव


    बुलाने के लिए कई नाम हैं


    जिसे पुकारो बोलता भी है

    पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो


    सब चौकन्ने हो जाते हैं

    सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं


    माँ... माँ... माँ...

    ओ लड़के


    ओ बेटा

    वह मेरी बेटी


    कहाँ मर गई हो

    माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा


    गली में से निकलता है

    सड़क पार करता है


    या पहाड़ चढ़ता है

    पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है


    तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह

    खिल उठती है


    दोनों दरवाज़े थाम कर देखती है

    गलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते


    माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं

    माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं


    मधुरता में नहला कर, चाव से भर कर

    ज़रा-सा डर कर आतुरता से


    माँ... माँ... माँ

    बछड़ा रंभाता है बां बां बां


    गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है

    मालिक का कोई डर नहीं रहता


    कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो

    कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ


    हाय बाप कोई नहीं कहता

    3 min
  • Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt

    दोनों ओर प्रेम पलता है।  मैथिलीशरण गुप्त 


    दोनों ओर प्रेम पलता है।

    सखि, पतंग भी जलता है

    हां! दीपक भी जलता है।


    सीस हिलाकर दीपक कहता - 

    ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’

    पर पतंग पड़ कर ही रहता

    कितनी विह्वलता है

    दोनों ओर प्रेम पलता है।


    बचकर हाय! पतंग मरे क्या?

    प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?

    जले नहीं तो मरा करे क्या?

    क्या यह असफ़लता है? 

    दोनों ओर प्रेम पलता है।


    कहता है पतंग मन मारे- 

    ’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,

    क्या न मरण भी हाथ हमारे?

    शरण किसे छलता है?’

    दोनों ओर प्रेम पलता है।


    दीपक के जलने में आली,

    फिर भी है जीवन की लाली।

    किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,

    किसका वश चलता है?

    दोनों ओर प्रेम पलता है।


    जगती वणिग्वृत्ति है रखती,

    उसे चाहती जिससे चखती;

    काम नहीं, परिणाम निरखती।

    मुझको ही खलता है।

    दोनों ओर प्रेम पलता है।


    3 min
  • Lipi | Hemant Deolekar

    लिपि । हेमंत देवलेकर 


    उन्होंने कहा

    -" लिखो"

    मैं मोबाइल पर टाइप करने लगा

    यह देख वे भड़क उठे

    -"हमने कहा, लिखो"


    मेरी याददाश्त पर गहरी चोट पड़ी

    और मोबाइल हाथ से गिर गया

    वे पूर्वज थे

    खिन्न होकर लौट गए

    मैने गिरे हए मोबाइल को देखा :

    मेरे हाथ से समूची लिपि फिसल गई थी


    2 min
  • Barsaat Mubarak Ho | Meena Kumari 'Naaz'

    बरसात मुबारक हो। मीना कुमारी नाज़


    बरसात मुबारक हो

    ये साथ मुबारक हो


    हर दिन रहे सलोना

    हर रात मुबारक हो


    सँवलाई हुई शामों को

    हर सुब्ह मुबारक हो


    हिचकी हो या सिसकी हो

    हर नग़्मा मुबारक हो


    बरसात मुबारक हो

    बरसात मुबारक हो

    2 min
  • Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan

    कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ ।  वाज़दा खान 

     

    केवल मिसाइलें ही गहरे

    मारक असर नहीं करतीं

    जीवन में और भी बहुत कुछ है 

    गहरा और असरदार


    कभी उतरो जो उन गहराइयों में

    जहां बेहद अन्धेरा है

    कहीं है चिड़िया की एक आवाज़

    कहीं चट्टानों के बीच दबा कोई रंग

    कहीं दरारों में बिंधा रुदन


    निश्चित रूप से हर असर

    गहरा अन्धेरा नहीं होता

    मगर जो गहरा और असरदार है उनमें से

    कुछ सितारों के साथ, तो कुछ

    दूसरे ग्रह के सूर्य के साथ

    छप जाते हैं पानी से लेकर

    उन हवाओं तक


    जो पिछली सदी और उससे भी

    पिछली सदी में और आज तक एक

    जैसी है, पानी भी एक जैसा है

    मगर कुछ है जो बदलता जा रहा है

    तेज़ी से वक्त के साथ 


    देख पाती हूं आंखों के भीतर

    चमकती धूप में पाती हूं तब

    कुछ सच्चाइयां, कुछ झूठ, कुछ गणनायें

    कुछ तथ्य, बहुत सारी चुप्पियां

    और तबाह कर देने वाला

    इक स्याह जुनून।

    3 min

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