आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ । गोपालदास नीरज
आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ
कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?
बम बारूद के इस दौर में मालूम नहीं
ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।
ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों की
और इंसान है एक कारतूस गोली का
सभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश है
और है रंग नया ख़ून नई होली का।
कौन जाने कि तेरी नर्गिसी आँखों में कल
स्वप्न सोए कि किसी स्वप्न का मरण सोए
और शैतान तेरे रेशमी आँचल से लिपट
चाँद रोए कि किसी चाँद का कफ़न रोए।
कुछ नहीं ठीक है कल मौत की इस घाटी में
किस समय किसके सबेरे की शाम हो जाए
डोली तू द्वार सितारों के सजाए ही रहे
और ये बारात अँधेरे में कहीं खो जाए।
मुफ़लिसी भूख ग़रीबी से दबे देश का दुख
डर है कल मुझको कहीं ख़ुद से न बाग़ी कर दे
ज़ुल्म की छाँह में दम तोड़ती साँसों का लहू
स्वर में मेरे न कहीं आग अंगारे भर दे।
चूड़ियाँ टूटी हुई नंगी सड़क की शायद
कल तेरे वास्ते कंगन न मुझे लाने दे
झुलसे बाग़ों का धुआँ खोए हुए पात कुसुम
गोरे हाथों में न मेहँदी का रंग आने दें।
यह भी मुमकिन है कि कल उजड़े हुए गाँव गली
मुझको फ़ुर्सत ही न दें तेरे निकट आने की
तेरी मदहोश नज़र की शराब पीने की
और उलझी हुई अलकें तेरी सुलझाने की।
फिर अगर सूने पेड़ द्वार सिसकते आँगन
क्या करूँगा जो मेरे फ़र्ज़ को ललकार उठे?
जाना होगा ही अगर अपने सफ़र से थक कर
मेरी हमराह मेरे गीत को पुकार उठे।
इसलिए आज तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ
आज मैं आग के दरिया में उतर जाऊँगा
गोरी-गोरी-सी तेरी संदली बाँहों की क़सम
लौट आया तो तुझे चाँद नया लाऊँगा।