Pratidin Ek Kavita

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By Nayi Dhara RadioArtsBooksFiction
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Pratidin Ek Kavita episodes

  • Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan

    कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ ।  वाज़दा खान 

     

    केवल मिसाइलें ही गहरे

    मारक असर नहीं करतीं

    जीवन में और भी बहुत कुछ है 

    गहरा और असरदार


    कभी उतरो जो उन गहराइयों में

    जहां बेहद अन्धेरा है

    कहीं है चिड़िया की एक आवाज़

    कहीं चट्टानों के बीच दबा कोई रंग

    कहीं दरारों में बिंधा रुदन


    निश्चित रूप से हर असर

    गहरा अन्धेरा नहीं होता

    मगर जो गहरा और असरदार है उनमें से

    कुछ सितारों के साथ, तो कुछ

    दूसरे ग्रह के सूर्य के साथ

    छप जाते हैं पानी से लेकर

    उन हवाओं तक


    जो पिछली सदी और उससे भी

    पिछली सदी में और आज तक एक

    जैसी है, पानी भी एक जैसा है

    मगर कुछ है जो बदलता जा रहा है

    तेज़ी से वक्त के साथ 


    देख पाती हूं आंखों के भीतर

    चमकती धूप में पाती हूं तब

    कुछ सच्चाइयां, कुछ झूठ, कुछ गणनायें

    कुछ तथ्य, बहुत सारी चुप्पियां

    और तबाह कर देने वाला

    इक स्याह जुनून।

    3 min
  • Mustanda Aur Bachcha | Shubha

    मुस्टंडा और बच्चा।  शुभा


    भाषा के अंदर बहुत सी बातें

    सबने मिलकर बनाई होती हैं


    इसलिए भाषा बहुत समय

    एक विश्वास की तरह चलती है


    जैसे हम अगर कहें बच्चा

    तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा


    लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है

    एक परजीवी


    एक तानाशाह

    फिर भी हम कहते रहते हैं—


    बच्चा! ओहो बच्चा!

    और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है


    किसी उजड़े हुए बूढ़े में

    किसी ठगी गई औरत में


    किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में

    छिपकर जान बचाता है बच्चा


    अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है

    इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है


    भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ

    2 min
  • Pukare Ja Rahe Ho Ajnabee Se | Zafar Gorakhpuri

    पुकारे जा रहे हो अजनबी से ।  ज़फ़र गोरखपुरी


    पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो


    ख़ुद अपने शोर में गुम आदमी से चाहते क्या हो

    ये आँखों में जो कुछ हैरत है क्या वो भी तुम्हें दे दें


    बना कर बुत हमें अब ख़ामुशी से चाहते क्या हो

    न इत्मिनान से बैठो न गहरी नींद सो पाओ


    मियाँ इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से चाहते क्या हो

    उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में


    ये सब कुछ जान कर आवारगी से चाहते क्या हो

    किनारों पर तुम्हारे वास्ते मोती बहा लाए


    घरौंदे भी नहीं तोड़े नदी से चाहते क्या हो

    चराग़-ए-शाम-ए-तन्हाई भी रौशन रख नहीं पाए


    अब और आगे हवा की दोस्ती से चाहते क्या हो


    3 min
  • Bin Gharni Ghar Bhoot ka Dhera | Abha Bodhisattva

    बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्व


    हज़ारों ग्रहों में

    यह धरती बहुत छोटी-सी है,


    हज़ारों घरों में

    बहुत छोटा है


    तुम्हारा घर

    तुम्हारा छोटा-सा घर था,


    ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से भरा

    फिर भी तुम्हारा मन नहीं


    लगता था उससे

    तुमने अपने मनोरथ के लिए,


    लिया मेरा साथ,

    क्योंकि


    बिना घरनी के तुम्हारा घर था

    भूत का डेरा


    2 min
  • Kehte Hain Taare Gaate Hain | Harivansh Rai Bachchan

    कहते हैं, तारे गाते हैं! । हरिवंश राय बच्चन


    कहते हैं, तारे गाते हैं!


    सन्नाटा वसुधा पर छाया,

    नभ में हमने कान लगाया,

    फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!

    कहते हैं, तारे गाते हैं!


    स्वर्ग सुना करता यह गाना,

    पृथ्वी ने तो बस यह जाना,

    अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!

    कहते हैं, तारे गाते हैं!


    ऊपर देव तले मानवगण,

    नभ में दोनों गायन-रोदन,

    राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं!

    कहते हैं, तारे गाते हैं!


    3 min
  • Antim Sipahi Ki Tarah | Leeladhar Mandloi

    अंतिम सिपाही की तरह । लीलाधर मंडलोई


    मैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सका

    मैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैं


    मैं रस्मी मातम में शरीक़ नहीं

    मैं उन आवाज़ों में हूँ जिनमें मुक्ति का गान गूँजता है


    मैं उनके लिए अपनी घृणाओं को आकाश करना चाहता हूँ

    मैं न्याय के लिए अंतिम सिपाही की तरह


    जीत के लिए मर जाना चाहता हूँ।


    2 min
  • Har Baar Deewaar | Jyotsna Milan

    हर बार दीवार।  ज्योत्स्ना मिलन


    आसमान होगा की उम्मीद में

    बाहर देखती खिड़की से


    बाहर

    दीवार होती सामने


    और होती

    फाँक भर धूप


    दो दीवारों के बीच धरी-सी

    दीवार की जगह


    आसमान नहीं निकला कभी

    घास का मैदान भी नहीं


    खिड़की के बाहर

    हर बार


    एक दीवार

    आसमान के बदले।


    2 min
  • Main Dhoondhta Hun Jisey | Kaifi Azmi

    मैं ढूँडता हूँ जिसे ।  कैफ़ी आज़मी


    मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता

    नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता


    नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए

    नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता


    वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा

    किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता


    वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे

    कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता


    जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ

    यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता


    खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में

    तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

    3 min
  • Mujhko Tera Shabab Le Baitha | Shiv Kumar Batalvi

    मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवी

    अनुवाद: आकाश 'अर्श'


    मुझ को तेरा शबाब ले बैठा

    रंग, गोरा गुलाब ले बैठा


    दिल का डर था कहीं न ले बैठे

    ले ही बैठा जनाब ले बैठा


    जब भी फ़ुर्सत मिली है फ़र्ज़ों से

    तेरे रुख़ की किताब ले बैठा


    कितनी बीती है कितनी बाक़ी है

    मुझ को इस का हिसाब ले बैठा


    मुझ को जब भी है तेरी याद आई

    दिन-दहाड़े शराब ले बैठा


    अच्छा होता सवाल ना करता

    मुझ को तेरा जवाब ले बैठा


    'शिव' को इक ग़म पे ही भरोसा था

    ग़म से कोरा जवाब ले बैठा


    3 min
  • Janamdin | Baby Shaw

    जन्मदिन ।  बेबी शॉ


     तुम्हें सोचते हुए

    रोज़

    एक नई दुनिया रचती हूँ


    मिट्टी के चावल

    धूल की सब्ज़ी

    पत्ते की रोटी


    खेल-घर जैसी...


    एक ऐसी दुनिया

    जिसे कोई नहीं जानता


    जहाँ

    प्रकाश-लोभ से

    स्वयं को जलाती हूँ मैं...

    2 min

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From the publisher's feed

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के…