Pratidin Ek Kavita

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Pratidin Ek Kavita episodes

  • Vismay Tarbooz Ki Tarah | Alok Dhanwa

    विस्मय तरबूज की तरह ।  आलोकधन्वा


    तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा

    जब मैं उसके किनारों से वापस आया


    वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं

    जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा


    वे जानवर

    जो सुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे


    और उन्हें इंतज़ार करना नहीं आता था

    और वे पहले छाते


    बादल जिनसे बहुत क़रीब थे

    समुद्र मुझे ले चला उस दुपहर में


    जब पुकारना भी नहीं आता था

    जब रोना ही पुकारना था


    जहाँ विस्मय

    तरबूज़ की तरह


    जितना हरा उतना ही लाल।

    3 min
  • Indhan | Gulzar

    ईंधन ।  गुलज़ार


    छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी

    हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे

    आँख लगाकर - कान बनाकर

    नाक सजाकर -

    पगड़ी वाला, टोपी वाला

    मेरा उपला -

    तेरा उपला -

    अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से

    उपले थापा करते थे


    हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर

    गोबर के उपलों पे खेला करता था

    रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था

    हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे

    किस उपले की बारी आयी

    किसका उपला राख हुआ

    वो पंडित था -

    इक मुन्ना था -

    इक दशरथ था -

    बरसों बाद - मैं

    श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ

    आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में

    इक दोस्त का उपला और गया !


    2 min
  • Kitabein | Tanwir Sheikh Ilham

     किताबें।  तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ 


    किताबें पढ़ा करों

    ये तार्किक बनाती हैं तुम्हें

    और बनाती हैं मार्मिक तुम्हारे विचारों को

    ताकि तुम अपने अधिकार को

    अपने कर्तव्य को समझ सको, परख सको

    किताबें पढ़ा करों

    क्योंकि ये तुम्हें साँचे में ढालकर

    तुम्हारे व्यक्तित्व को और अद्वितीय बनाती है

    ठीक उस कुम्हार की तरह जो

    खुरदुरी मिट्टी को साँचकर

    उसका मोल बढ़ाते हैं

    तो तुम पढ़ो किताबें

    जितनी हो सके पढ़ो 

    ताकि तुम ख़ुद को जान सको

    और जान सकों अपने हृदय की चाहत को

    ताकि लड़कर जीत सकों उस समाज से

    जिसने तुम्हें जकड़े रखा है


    तो तुम पढ़ो...

    और तब तक मत रुको

    जब तक तुम उस आसमाँ को पा न लो

    जो तुम्हारा ही है

    और आत्मसात कर लो कि

    ये किताबें क्रांति है

    इसे पढ़ने वाला

    इसे समझने वाला

    और इसका प्रयोग करने वाला

    हर एक मनुष्य क्रांतिकारी है!


    3 min
  • Upeksha | Subhadra Kumari Chauhan

    उपेक्षा ।  सुभद्राकुमारी चौहान


    इस तरह उपेक्षा मेरी,

    क्यों करते हो मतवाले!

    आशा के कितने अंकुर,

    मैंने हैं उर में पाले॥


    विश्वास-वारि से उनको,

    मैंने है सींच बढ़ाए।

    निर्मल निकुंज में मन के,

    रहती हूँ सदा छिपाए॥


    मेरी साँसों की लू से

    कुछ आँच न उनमें आए।

    मेरे अंतर की ज्वाला

    उनको न कभी झुलसाए॥


    कितने प्रयत्न से उनको,

    मैं हृदय-नीड़ में अपने

    बढ़ते लख खुश होती थी,

    देखा करती थी सपने॥


    इस भांति उपेक्षा मेरी

    करके मेरी अवहेला

    तुमने आशा की कलियाँ

    मसलीं खिलने की बेला॥


    2 min
  • Mujhe Teen Do Shabd | Agyeya

    मुझे तीन दो शब्द । अज्ञेय


    मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।


    एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ,

    और दूसरा : जिसे कह सकूँ

    किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।

    और तीसरा : खरा धातु, पर जिसको पाकर पूछूँ—

    क्या न बिना इसके भी काम चलेगा? और मौन रह जाऊँ।


    मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।


    2 min
  • Gawahi | Adnan Kafeel Darwesh

    गवाही।  अदनान कफ़ील दरवेश 


    क़ब्र में

    मेरी बगल में ही लिटाना

    मेरी कविता को भी

    जो मेरी दोस्त रही

    मेरे उन यातना के क्षणों में भी

    इस तरह हम एक साथ उठेंगे

    महशर के रोज़

    शुभ दिन बोलते हुए

    एक दूसरे को

    उसे लिटाना ज़रूर

    क्योंकि उसे सबसे बड़ी अदालत में

    उस दिन

    मेरे ख़िलाफ़ गवाही देनी है।


    2 min
  • Kashi Mere Kashi | Aishwarya Tiwari

    काशी मेरे काशी । ऐश्वर्या तिवारी


    मैं निरे शुन्य मैं बैठी 

    वो जब आया था तो शुन्य हुए आया था

    हर बार कहता था -

    मैं कुछ नहीं, कोई नहीं मैं।

    हम मिलते

    बैठते कई घंटों

    फिर चले जाते,

    एक दिन मिलते हुए मैंने कहा - साड़ी

    और देखा उसे होते हुए बुनकर

    जोड़-तोड़ कर ताना-बाना

    बुनने लगा है साड़ी

    परखने आ गया है उसे

    धागों की बुनावट का सलीका।

    मैंने कहा सीपियों वाले झुमके

    उसे देखा समन्दर किनारे

    बढ़ गई है उसकी यात्रा

    थोड़ा और सीखने लगा है वो तैराकी

    अब नहीं कहता कि डरता है वो बहते पानी से।

    मैंने जैसे ही कहा भूख

    वो था कहीं किसी खेत की मेड़ पर

    अपना खुरपी कुदाल लिए

    हाँकते हुए बैलों को

    करते हुए अगले फसल के बुआई की तैयारी।


    फिर मैंने जब कहा छाँव

    उसे पेड़ होते पाया;

    खुशबू के सुनते ही

    मुझे उसका गुलाब, मोगरा, शिउली होना याद है।

    मैंने कहा स्पर्श

    और मुझे याद है उसका बच्चा होना

     मेरे माथे को चूमना,

    मैंने जब भी कहा दुःख

    उसने गले लगाने में ज़रा देर नहीं की।

    मैंने जैसे ही कहा इंतज़ार

    उसे पहाड़ होना आ गया,

    मेरे सफ़र कहते ही

    बहने लगा वो नदी-सा कल-कल।

    मैं जो-जो कहती गई

    वो सो-सो होता गया

    मैं जो बैठी थी शून्य में

    वो जो कहता था - मैं कुछ नहीं, कोई नहीं हूँ 

    इसी तरह एक दिन

    मैं कहूँगी काशी...

    मेरे काशी..

    और देखूंगी

    कैसे होता है वो

    अपने आप से मुक्त

    और सिमट कर आ जाता है मुझमें

    जैसे दुनिया की नाभि से काटकर


    अंतिम बार लाए जाते हैं लोग मणिकर्णिका के घाट पर।

    मेरा कहना और उसका होते जाना

    मेरी इच्छाए और उसकी फ़क़ीरी

    गुँथ जाएगी इस तरह

    कि एक दिन वो कहेगा कुछ

    और मैं होती जाउंगी उसके कहे अनुसार

    हम हमारे बन्धन भी हैं

    और हम ही हैं हमारी मुक्ति भी।


    4 min
  • Parakhna Mat | Bashir Badr

    परखना मत । बशीर बद्र


    परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता


    किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता

    बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना


    जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता

    हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में


    अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता

    मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है


    कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता


    तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज़ वाला है

    हमारे शहर में भी अब कोई हम सा नहीं रहता 


    3 min
  • Kalam | Vishwanath Prasad Tiwari

     कलम। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 


    कलम

    उठाओ इसे

    इसमें छिपा है

    देवताओं-अप्सराओं का गान

    अबोध शिशुओं की मुस्कान

    यह भर सकती है फूलों में रंग

    पानी में आग

    और आग में थोड़ी-सी रोशनी

    फेंको इसे तौलकर

    शिलाखंड से फूट पड़ेंगे निर्झर 

    बह जाएँगे ब्रह्मास्त्र

    यह दे सकती है

    अनाम को नाम

    अरूप को रूप

    सन्नाटे को शब्द

    मिटा सकती है

    जंगल और समुद्र की लिपि

    बना सकती है

    धरती का व्याकरण

    अगर तुम्हारी गफलत से

    यह पड़ी रह गई अँधेरे में

    तो धरती पर छा जाएगा अंधकार

    दहाड़ने लगेंगे हिंस्त्र पशु

    उठाओ इसे

    सिसक रही है यह अँधेरे में असहाय

    इसे चाहिए एक हाथ

    जिसने वेद लिखा

    और लोहा गलाया

    इसे चाहिए एक हाथ

    जो कभी मत लिखे उपसंहार

    उपसंहार के लिए छोड़ जाए

    इसे।


    3 min
  • Nayi Nayi Aankhein Hon To | Nida Fazli

    नई नई आँखें हों तो ।  निदा फ़ाज़ली


    नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है


    कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है

    मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं


    जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है

    मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे


    सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है

    चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं


    जो मूरत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है

    हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में


    जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है

    नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है

    3 min

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के…