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अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी
चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश।
पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास?
कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे।
शामिल रहते हो या मात-पिता से न्यारे?
कह ‘काका’ कवि, छान-बीन काफ़ी की जाती।
साथ सिफ़ारिश हो, तब ही सर्विस मिल पाती॥
कर्मचारियों के लिए, है अनेक दुख-द्वंद्व।
नेताजी के वास्ते, एक नहीं प्रतिबंध॥
एक नहीं प्रतिबंध, मंच पर झाड़े लेक्चर।
वैसे उनकी भैंस बराबर काला अक्षर॥
कह ‘काका’, दर्शन करवा सकता हूँ प्यारे।
एम.एल.ए. कई, ‘अँगूठा छाप’ हमारे॥
बिटिया मुर्मू के लिए | निर्मला पुतुल
उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो
उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़
उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो
जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है
उठती है जैसी राख में दबी चिनगारी
देखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त पर
जहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़
कुल्हाड़ियों के सामने असहाय
रोज़ नंगी होती बस्तियाँ
एक रोज़ माँगेगी तुमसे
तुम्हारी ख़ामोशी का जवाब
सोचो-
तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैं
तुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों पर
कैसा लगता है तुम्हें जब
तुम्हारी ही चीज़ें
तुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं ?
संतुलन के लिए । शायक आलोक
वे जिस दुनिया में आए हैं वह है
एक हँसती खिलखिलाती दुनिया।
सब सुंदर है, लगे उन्हें
इसलिए मैं मुस्कुरा देता हूँ
नए बच्चों की तरफ़
आँखें मिचमिचा देता हूँ।
एक दुख की कथा से
दूसरे दुख के किरदार को मिलता है सहारा
इसलिए मैंने अपवित्र पवित्रताओं को जीवन में उतारा।
दुनिया के सार्वजनिक शोकागार में आँखें नम रखता हूँ
संतुलन के कई पाठ रचे
वे ही रहीं सबसे कम सुंदर स्त्रियाँ
जिन्हें मैं करता रहा दुनिया का सबसे अधिक प्रेम।
कोई मेरे साथ चले। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
मैंने कब कहा
कोई मेरे साथ चले
चाहा ज़रूर!
अक्सर दरख्तों के लिये
जूते सिलवा लाया
और उनके पास खडा रहा
वे अपनी हरीयाली
अपने फूल फूल पर इतराते
अपनी चिडियों में उलझे रहे
मैं आगे बढ गया
अपने पैरों को
उनकी तरह
जडों में नहीं बदल पाया
यह जानते हुए भी
कि आगे बढना
निरंतर कुछ खोते जाना
और अकेले होते जाना है
मैं यहाँ तक आ गया हूँ
जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं
मुझे घेरे हुए हैं......
किसी साथ के
या डूबते सूरज के कारण
मुझे नहीं मालूम
मुझे
और आगे जाना है
कोई मेरे साथ चले
मैंने कब कहा
चाहा ज़रूर!
अहा बुद्धिमानों की बस्ती । महेश अनघ
अहा बुद्धिमानों की बस्ती
या तो चुप्पी या तकरार -
कोने-कोने भूत बियाने
सारा घर सन्नाटेदार ।
सूचीबद्ध हुई दिनचर्या
मज़बूरी रेखांकित है
चौके से चूल्हे की अनबन
हर भांडा आतंकित है
किसी ख़ास दिन ख़ास वजह से
काग़ज़ पर लिखते हैं प्यार।
यों तो इस भुतहा बाखर में
कोई आएगा ही क्यों
जिस धन से ख़ुशबू ग़ायब है
उसे चुराएगा ही क्यों
फिर भी ताला है, कुत्ता है
और गोरखा चौकीदार ।
अपना क़द ऊँचा रखने में
झुक कर चलना छूट गया
विज्ञापन से जोड़ा रिश्ता
विज्ञापन से टूट गया
इतनी चीज़ें जुड़ीं कि हम भी
चीज़ों में हो गए शुमार ।
माँ के लिए नहीं लिखी कविता । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’
आज तक
मैंने एक भी कविता
माँ के लिए या उनके नाम पर नहीं लिखी
लिखना भी चाहा तो
नही लिख पाया
बहुत कोशिश की
हर भाषा
हर बोली
हर शब्द के आंगन गया
पर वो अक्षर ढूंढ न सका
जो माँ को परिभाषित कर सके
जो माँ की ममता और
उनके त्याग को रेखांकित कर सके
मैं दूंढ़ ही नहीं पाया
पूरी दुनिया की भाषाओं में
जो ढाल सके माँ को कविताओं में
अंतः मैंने इस प्रयास में पाया
मुझे तो ख़ुद गढ़ा है माँ ने
मैं ही तो हूँ उनकी कविता
उनका अंश
जो गढ़ रहा है कविताएं
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ । जयप्रकाश मानस
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ
हाँ तितलियाँ
फूलों से लता-वल्लरियों से
अचीन्हे पराए मंजरियों से
कहाँ परवाह
कि झट झर जाएँगे पर
नहीं झंझट
कभी जा पहुँचें नभ पर
तनिक न भय
कि जीवन दो दिना
बस यही सच
प्यार है अर्थ—शब्द जीना
धरा-विस्तार करती हैं तितलियाँ
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ।
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए । मोहम्मद अल्वी
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए
उस की तस्वीर हटा दी जाए
ढूँडने में भी मज़ा आता है
कोई शय रख के भुला दी जाए
नाम लिख लिख के तिरा काग़ज़ पर
रौशनाई भी गिरा दी जाए
नाव काग़ज़ की बना कर उस को
बहते पानी में बहा दी जाए
रात को चुपके से इक इक घर की
क्यूँ न ज़ंजीर लगा दी जाए
नींद में चौंक पड़ेगा कोई
आओ उस दर पे सदा दी जाए
आख़िरी साँस महक जाएगी
उस के दामन की हवा दी जाए
सब के सब याद चले आते हैं
आज किस किस को दुआ दी जाए
'अल्वी' होटल में ठहर सकता है
क्यूँ उसे घर में जगह दी जाए
मसखरी । आशुतोष शर्मा
गए रोज़ इक दोस्त को मिल गयी उसकी खोई हुई प्रेमिका
मुझे उसकी खोई हुई हंसी को पा जाने की थी ख़ुशी
लौट आने का सुख सबको नहीं मिलता,
हँसी मिल जाती है और भी कई बहानों से
प्रेमिकाओं के चले जाने का दुःख सबको नहीं मिलता
जिनको लगता है मैं हूँ एक हंसोल मसखरा
संवेदना का मज़ाक उड़ाता हुआ
उपेक्षा का एक भदेस चरवाहा
तो हाँ ,
किसी रोज़ खो गई थी मेरी भी प्रेमिका
और हँसी भी
वो और बात है कि अकुताकर मैंने ही चुनी थी
प्रेम और हँसी के बीच...
जब मैं थका हुआ घर आऊँ । शकुन्त माथुर
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो।
चाहे दिन भर बहें पसीने
कितने भी हों कपड़े सीने
बच्चा भी रोता हो गीला
आलू भी हो आधा छीला
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो
सब तूफ़ान रुके हों घर के
मुझको देखो आँखें भर के
ना जूड़े में फूल सजाए
ना तितली से वसन, न नखरे
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो
अधलेटी हो तुम सोफ़े पर
फॉरेन मैगज़ीन पढ़ती हो
शीशे सा घर साफ़ पड़ा हो
आहट पर चौंकी पड़ती हो
तुम कविता मत लिखो सलोनी,
मैं काफी हूँ, तुम प्रियतर हो
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो।
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