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बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर
बुरी औरत के सपनों में
नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ
बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर
बुरी औरत के सपनों में नहीं होती
बदन को धरती बनाकर
धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति
बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला
परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का
पाखण्ड-पर्व
कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में
दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की
चहारदीवारी में
आत्महत्या का अनायास आदर्श नहीं होता
बुरी औरत के सपनों में।
बुरी औरत के सपनों में आता है
एक स्वच्छन्द बहती हुई नदी का दृश्य
और मनचाहे फूल पर बैठती हुई
तितली के पंख
बुरी औरत के सपनों में
बार-बार आता है जिबह करने को
लाया जाता ख़ूबसूरत मेमना
उसके स्वच्छन्द बहते रंगों पर
टपक जाते हैं
किसी निर्दोष आत्मा के पवित्र
प्रेमाश्रु
बुरी औरत के सपनों में उबलता है
बुरे लोगों के बुरे कामों के विरूद्ध
हृदय का लावा ।
प्रेम की अनिवार्थता । हेमंत देवलेकर
बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने
और अंततः हमें मनुष्य बनाया
लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा
उस प्रेम के हर उपकार का
ध्वंस करने पर तुली
दिया जिसने
सब कुछ न्यौछावर कर देने का भोलापन,
तर्क न करने की सहजता
और रोने की मानवीय उपलब्धि
प्रेम ने हमारी ऊबड़ - खाबड़, जाहिल-सी
भाषा को कविता की कला सिखाई
और ज़िन्दगी के घोर कोलाहल में
एकांत की दुआ मांगना
संभव नहीं था प्रेम के बिना
सुंदरता का अर्थ समझना
प्रेम होना ही सबसे बड़ी सफलता है
कोई असफल कैसे हो सकता है प्रेम में ...
सांध्य वंदना । सुमित्रानंदन पंत
जीवन का श्रम ताप हरो हे!
सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे!
सूने जग गृह द्वार भरो हे!
लौटे गृह सब श्रान्त चराचर
नीरव, तरु अधरों पर मर्मर,
करुणानत निज कर पल्लव से
विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!
उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल,
स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल
तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि!
सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!
आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा
आज शाम है बहुत उदास
केवल मैं हूँ अपने पास ।
दूर कहीं पर हास-विलास
दूर कहीं उत्सव-उल्लास
दूर छिटक कर कहीं खो गया
मेरा चिर-संचित विश्वास ।
कुछ भूला सा और भ्रमा सा
केवल मैं हूँ अपने पास
एक धुन्ध में कुछ सहमी सी
आज शाम है बहुत उदास ।
एकाकीपन का एकान्त
कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त ।
थकी-थकी सी मेरी साँसें
पवन घुटन से भरा अशान्त,
ऐसा लगता अवरोधों से
यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त।
अंधकार में खोया-खोया
एकाकीपन का एकान्त
मेरे आगे जो कुछ भी वह
कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त।
उतर रहा तम का अम्बार
मेरे मन में व्यथा अपार।
आदि-अन्त की सीमाओं में
काल अवधि का यह विस्तार
क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर ?
एक प्रश्न मैं हूँ साकार।
क्यों बनना? क्यों बनकर मिटना?
मेरे मन में व्यथा अपार
औ समेटता निज में सब कुछ
उतर रहा तम का अम्बार।
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
आज शाम है बहुत उदास।
जोकि आज था तोड़ रहा वह
बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस
और अनिश्चित कल में ही है
मेरी आस्था, मेरी आस।
जीवन रेंग रहा है लेकर
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
और डूबती हुई अमा में
आज शाम है बहुत उदास।
पिन बहुत सारे। कुँअर बेचैन
जिंदगी का अर्थ
मरना हो गया है
और जीने के लिये हैं
दिन बहुत सारे ।
इस
समय की मेज़ पर
रक्खी हुई
जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी
दोस्ती का अर्थ
चुभना हो गया है
और चुभने के लिए हैं
पिन बहुत सारे।
निम्न-मध्यमवर्ग के
परिवार की
अल्पमासिक आय-सी
है जिंदगी
वेतनों का अर्थ
चुकना हो गया है
और चुकने के लिए हैं
ऋण बहुत सारे।
बागी बियाबान औरतें। ऐश्वर्या तिवारी
लोग कहते हैं
वो औरत है ही कहाँ,
ज़्यादा सही शब्द है
आफ़त।
उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं,
एक सूखी नदी लटकी है
जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी
और आधे में ही डर गया।
वो हँसती है तो लगता है
जैसे किसी पुराने मकान की दीवार
अचानक गिर पडी हो -
लोग भागते हैं मलबा बचाने,
वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है।
उसकी देह पर कपड़े कम हैं,
किस्से ज़्यादा।
हर तह से कोई मर्द निकलता है
जो कभी उसे देवी बुलाता था,
कभी डायन,
और कभी 'दोस्त',
और हर नाम के साथ
उसके भीतर की मिट्टी और पत्थर
थोड़े-थोड़े हमेशा बदलते रहे हैं।
वो बियाबान है
क्योंकि उसने अपने भीतर की
हरी घास खुद उखाड़कर फेंक दी थी।
जिस दिन उसे समझ आया
कि लोग उसकी खूबसूरती पर नहीं,
उसकी "कमीज़ की आख़िरी बटन" पर
कविताएं लिखते हैं।
उस रात उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा था
"ये दिल नहीं, अदालत है,
और आज से सिर्फ यहाँ एक ही मुकदमा चलेगा
ख़ुद बनाम दुनिया।"
वो चाय बनाते हुए भी
इंक़लाब सोचती है,
लोटे में पानी भरते हुए
आज़ादी मापती है,
और जब दुपट्टा झाड़ती है
तो जैसे सदियों की धूल
आसमान पर फेंक देती है
कोई तारा कम भी हो जाए,
तो उसे कोई परवाह नहीं।
उसकी चाल में बाज़ार की चालाकी नहीं,
कब्रिस्तान जैसी सच्चाई है -
शांत, साफ़, अन्तिम।
वो किसी की अमानत नहीं,
ना बाप की इज्ज़त,
ना पति की नाक,
ना प्रेमी का राज़
वो अपने ही गुनाहों की
इकलौती वारिस है -
गिनती भी खुद रखती है,
और माफ़ी भी खुद दे देती है।
लोग उसे "बागी" बुलाते हैं
क्योंकि वो "हाँ से पहले
"क्यों' पूछ लेती है,
"कब लौटोगे?" से पहले
"क्यों रहूं" सोच लेती है।
वो बियाबान है
पर सूखा नहीं।
उसके भीतर किसी पुराने मेहबूब की
भूली हुई ख़ुशबू बसी हुई है
कभी-कभी रात में
वो खुद से पूछती है -
"अगर मैं इतनी ही बुरी हूँ
तो मेरी आँख में पानी का एक कतरा
अब भी क्यों बाकी है?"
कोई जवाब नहीं देता।
बस उसकी परछाई
दीवार से उतरकर
उसके साथ बैठ जाती है।
दोनों मिलकर सिगरेट सुलगाती हैं,
एक ही धुए को भीतर खींचती हैं
फ़र्क़ बस इतना है,
कि एक की आँख में आँसू हैं,
और दुसरे की आँख में आग।
सुबह होते-होते
आग और आँसू
एक ही नमी में बदल जाते हैं।
और वो औरत,
जो शहर की नज़रों में
"बागी बियाबान" है,
अपने भीतर से
चुपचाप एक नन्हा सा बीज उठाती है,
ज़मीन में नहीं,
ज़ुबान पर बो देती है
ताकि अगली बार
जब वो बोले,
कोई फूल नहीं,
सीधा जंगल उगे।
प्यार । सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
इस पेड में
कल जहाँ पत्तियाँ थीं
आज वहाँ फूल हैं
जहाँ फूल थे
वहाँ फल हैं
जहाँ फल थे
वहाँ संगीत के
तमाम निर्झर झर रहे हैं
उन निर्झरों में
जहाँ शिला खंड थे
वहाँ चाँद तारे हैं
उन चाँद तारों में
जहाँ तुम थीं
वहाँ आज मैं हूँ
और मुझमें जहाँ अँधेरा था
वहाँ अनंत आलोक फैला हुआ है
लेकिन उस आलोक में
हर क्षण
उन पत्तियों को ही मैं खोज रहा हूँ
जहाँ से मैंने- तुम्हें पाना शुरु किया था!
मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी
मेरा उसका परिचय इतना
वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ।
उसकी सीमा सागर तक है
मेरा कोई छोर नहीं है।
मेरी प्यास चुरा ले जाए
ऐसा कोई चोर नहीं है।
मेरा उसका इतना नाता
वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ।
उस पर तैरें दीप शिखाएँ
सूनी सूनी मेरी राहें।
उसके तट पर भीड़ लगी है
कौन करेगा मुझसे बातें।
मेरा उसका अंतर इतना
वो बस्ती है, मैं जंगल हूँ।
उसमें एक निरन्तरता है
मैं तो स्थिर हूँ जनम जनम से।
वो है साथ साथ ऋतुओं के
मेरा क्या रिश्ता मौसम से।
मेरा उसका जीवन इतना
वो इक युग है मैं इक पल हूँ।
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है । शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है
इक और ज़ाविए से आसमान लगता है
जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक
वो दिल जो वक़्त-ए-दुआ बे-ज़बान लगता है
शुरू-ए-इश्क़ में सब ज़ुल्फ़ ओ ख़त से डरते हैं
अख़ीर उम्र में इन ही में ध्यान लगता है
सरकने लगती है तब ही क़दम तले से ज़मीन
जब अपने हाथ में सारा जहान लगता है
दो चार घाटियाँ इक दश्त कुछ नदी नाले
बस इस के बाद हमारा मकान लगता है
हवा जब आएगी | चंपा वैद
हवा जल आएगी अकेली
बैठा लूँगी अपने पास
चले चलेंगे हम दोनों
उस कविता के पर्वत पर
उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार
चश्मों से एकत्रित कर जल
और सूरज के प्रबल प्रकाश
मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर
हवा तुम्हारे साथ
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