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दाँत की खिड़की। नीलेश रघुवंशी
बारिश से पहले बादलों की गड़गड़ाहट
बिजली के चमकने-सा मुस्कराता चेहरा सहेली का
तिस पर "पहचाना-पहचाना' भरी बारिश में छपाक-छपाक की आवाज़
हा याद आया अपन एक बार..कहते सिर खुजलाना
पीठ पर पड़ती धौल तुम क्यों पहचानोगी भैया
झमाझम बारिश में बिना छतरी के भीग-भीग जाना
गलबहियाँ डाल सहेली करो याद करो याद की रट लगाए
घूमते हैं आँखों के आगे हजारों हज़ार चेहरे
अँटता नहीं जिनमें चेहरा सहेली का
चमकी बिजली ज़ोर से...
स्कूल के दिनों में शरमाकर हँसती थी जब सहेली
झिलमिलाती थी उसके दाँतों के बीच की जगह
जिसे हम सब दाँत की खिड़की कह चिढ़ाते खूब
ओह याद...याद आया मेरी प्यारी दात की खिडकी
कह झूमती हूँ सहेली से
हटो दूर दूर हटो इतनी देर बाद पहचानीं
भरी बरसात में ज़ोर से चमकती है बिजली
दूर उड़ती जाती छतरी की तरह रुकती नहीं हमारी हँसी
By Nayi Dhara Radioदाँत की खिड़की। नीलेश रघुवंशी
बारिश से पहले बादलों की गड़गड़ाहट
बिजली के चमकने-सा मुस्कराता चेहरा सहेली का
तिस पर "पहचाना-पहचाना' भरी बारिश में छपाक-छपाक की आवाज़
हा याद आया अपन एक बार..कहते सिर खुजलाना
पीठ पर पड़ती धौल तुम क्यों पहचानोगी भैया
झमाझम बारिश में बिना छतरी के भीग-भीग जाना
गलबहियाँ डाल सहेली करो याद करो याद की रट लगाए
घूमते हैं आँखों के आगे हजारों हज़ार चेहरे
अँटता नहीं जिनमें चेहरा सहेली का
चमकी बिजली ज़ोर से...
स्कूल के दिनों में शरमाकर हँसती थी जब सहेली
झिलमिलाती थी उसके दाँतों के बीच की जगह
जिसे हम सब दाँत की खिड़की कह चिढ़ाते खूब
ओह याद...याद आया मेरी प्यारी दात की खिडकी
कह झूमती हूँ सहेली से
हटो दूर दूर हटो इतनी देर बाद पहचानीं
भरी बरसात में ज़ोर से चमकती है बिजली
दूर उड़ती जाती छतरी की तरह रुकती नहीं हमारी हँसी