Radio Sabrang

अब मैं जीना चाहती हूँ...


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ज़िंदगी की भाग-दौड़ और रोज़ की कश्मकश में ख़ुद की पहचान ख़त्म करके घर-परिवार के लिए काम करने वाली एक औरत भी एक मक़ाम पर जीना चाहती है- अपने लिए। घर वालों की सलामती और उनकी ज़िंदग़ी को पटरी पर बनाए रखने के लिए ख़ुद के बारे में नहीं सोचने वाली महिला जब ठहरकर सोचे तो लगता है कि कुछ पल तो ख़ुद के लिए भी जीने चाहिए। ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ रेडियो सबरंग की रमणी श्याम की कलम से-

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