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बात उन दिनों की है । राजेंद्र शर्मा
बात उन दिनों की है
जब नहीं था रंगीन टेलीविज़न
इक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता था
शटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न ।
रविवार को आने वाली पिक्चर
देखने पूरा मोहल्ला पहुँचता
टेलीविज़न वाले घर
अहाते मे लगाया जाता टेलीविज़न
पूरा मोहल्ला देखता पिक्चर
मध्यातंर मे जब सलमा सुल्तान
अपने जूड़े मे लगाए गुलाब का फूल
अपनी बेशक़ीमती मुस्कुराहट से पढ़ती समाचार
पूरे मोहल्ले को चाय पिलाता
टेलीविज़न वाला घर।
इस बीच लोग बतियाते
पूछते एक-दूसरे का हाल
पिक्चर ख़त्म होने पर
पूरा मोहल्ला लौटता
अपने-अपने घर
मनोरंजन के साथ
संबंधों की असीम ऊष्मा के साथ।
अब हर घर में रंगीन टेलीविज़न
कोई किसी के यहाँ नहीं जाता
देखने टेलीविज़न
पुराने पड़ोसी को नहीं पता
अपने नए पड़ोसी का नाम
नए पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहीं
पुराने पड़ोसी में
अब हर आदमी है अपने में समृद्ध
बात उन दिनों की है
जब नहीं था मोबाइल फ़ोन
इक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता था
काला चोग़े वाला टेलीफ़ोन
जिसका नंबर पूरा मोहल्ला
बाँटता अपने रिश्तेदारों को
पीपी के रूप में
पड़ोसी का फ़ोन आता
पाँच मिनट का समय माँगकर
टेलीफ़ोन वाला पड़ोसी
बुलाता अपने पड़ोसी को
वह आता
फ़ोन अटैंड करता।
फिर वही बैठता कुछ देर
भाई साहब, भाभी जी से बतियाता
पूछता और बताता कुशल-क्षेम
चाय पीकर वहाँ से लौटता
संबंधों की असीम ऊष्मा के साथ
अब हर जेब में है मोबाइल
हर आदमी है समृद्ध
कोई किसी के यहाँ नहीं सुनने जाता
टेलीफ़ोन
पुराने पड़ोसी को नहीं पता
नए पड़ोसी का नाम
नए पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहीं
पुराने पड़ोसी में
मोहल्ले भर में
संबंधों की जो ऊष्मा महकती थी
दिन-रात
वह अब लुप्त हो गई है
सोचता हूँ मैं
समृद्धि
क्यों लील लेती है
संबंधों की ऊष्मा...
By Nayi Dhara Radioबात उन दिनों की है । राजेंद्र शर्मा
बात उन दिनों की है
जब नहीं था रंगीन टेलीविज़न
इक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता था
शटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न ।
रविवार को आने वाली पिक्चर
देखने पूरा मोहल्ला पहुँचता
टेलीविज़न वाले घर
अहाते मे लगाया जाता टेलीविज़न
पूरा मोहल्ला देखता पिक्चर
मध्यातंर मे जब सलमा सुल्तान
अपने जूड़े मे लगाए गुलाब का फूल
अपनी बेशक़ीमती मुस्कुराहट से पढ़ती समाचार
पूरे मोहल्ले को चाय पिलाता
टेलीविज़न वाला घर।
इस बीच लोग बतियाते
पूछते एक-दूसरे का हाल
पिक्चर ख़त्म होने पर
पूरा मोहल्ला लौटता
अपने-अपने घर
मनोरंजन के साथ
संबंधों की असीम ऊष्मा के साथ।
अब हर घर में रंगीन टेलीविज़न
कोई किसी के यहाँ नहीं जाता
देखने टेलीविज़न
पुराने पड़ोसी को नहीं पता
अपने नए पड़ोसी का नाम
नए पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहीं
पुराने पड़ोसी में
अब हर आदमी है अपने में समृद्ध
बात उन दिनों की है
जब नहीं था मोबाइल फ़ोन
इक्का-दुक्का समृद्ध घरों में ही होता था
काला चोग़े वाला टेलीफ़ोन
जिसका नंबर पूरा मोहल्ला
बाँटता अपने रिश्तेदारों को
पीपी के रूप में
पड़ोसी का फ़ोन आता
पाँच मिनट का समय माँगकर
टेलीफ़ोन वाला पड़ोसी
बुलाता अपने पड़ोसी को
वह आता
फ़ोन अटैंड करता।
फिर वही बैठता कुछ देर
भाई साहब, भाभी जी से बतियाता
पूछता और बताता कुशल-क्षेम
चाय पीकर वहाँ से लौटता
संबंधों की असीम ऊष्मा के साथ
अब हर जेब में है मोबाइल
हर आदमी है समृद्ध
कोई किसी के यहाँ नहीं सुनने जाता
टेलीफ़ोन
पुराने पड़ोसी को नहीं पता
नए पड़ोसी का नाम
नए पड़ोसी की कोई दिलचस्पी नहीं
पुराने पड़ोसी में
मोहल्ले भर में
संबंधों की जो ऊष्मा महकती थी
दिन-रात
वह अब लुप्त हो गई है
सोचता हूँ मैं
समृद्धि
क्यों लील लेती है
संबंधों की ऊष्मा...