राहुल सांकृत्यायन की ऐतिहासिक किताब 'वोल्गा से गंगा' की दूसरी कहानी 'दिवा' के इस एपिसोड में आपका स्वागत है!
हम आपको ले चलते हैं लगभग ईसा पूर्व 5500 के उस दौर में, जहाँ वोल्गा नदी के किनारे मानव सभ्यता अपने शुरुआती दौर से गुज़र रही थी। यह कहानी एक ऐसे मातृसत्तात्मक (Matriarchal) समाज को दर्शाती है जहाँ न संपत्ति का विचार था और न विवाह का कोई सामाजिक बंधन—कबीले की असली शक्ति और नेतृत्व नारी के हाथों में था।
आवाज़ - रवि शेखर
इस एपिसोड में सुनिए:
कबीलाई जीवन: प्रकृति और जानवरों की चुनौतियों के बीच शुरुआती इंसान का जीवन।
मातृसत्ता का दौर: दिवा का नेतृत्व, उसकी सूझबूझ और कबीले की सुरक्षा के लिए उसका संघर्ष।
सभ्यता का विकास: कैसे आग, शिकार और सामूहिक जीवन ने इंसान के भविष्य की नींव रखी।
समय के पहिए को 7500 साल पीछे घुमाइए और सुनिए उस दौर की कहानी जब कबीले की माँ ही उसकी रक्षक और मार्गदर्शक थी।
🎧 पॉडकास्ट अभी सुनें और इतिहास के इस अनसुने पहलू को महसूस करें!
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