Pratidin Ek Kavita

Chithi Hai Kissi Dukhi Mann Ki | Kunwar Bechain


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 चिट्ठी है किसी दुखी मन की |  कुँवर बेचैन 


बर्तन की यह उठका-पटकी

यह बात-बात पर झल्लाना

चिट्ठी है किसी दुखी मन की।


यह थकी देह पर कर्मभार

इसको खाँसी, उसको बुखार

जितना वेतन, उतना उधार

नन्हें-मुन्नों को गुस्से में

हर बार, मारकर पछताना

चिट्ठी है किसी दुखी मन की।


इतने धंधे! यह क्षीणकाय-

ढोती ही रहती विवश हाय

खुद ही उलझन, खुद ही उपाय

आने पर किसी अतिथि जन के

दुख में भी सहसा हँस जाना

चिट्ठी है किसी दुखी मन की।


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