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दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि
कच्चे घर में
जलते दीए की रोशनी पर
क़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।
लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।
जो पर्त दर-पर्त
कालिख पोत रहा है
दीवार पर,
नीचे गहरा अँधेरा है
जिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैं
हज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।
मेरी पिंडलियों
और भुजाओं के माँस से बनी हैं बाती
हड्डियों को निचोड़कर
निकाला गया है तेल।
अँधेरे में,
कालिख पुता मेरा जिस्म
जिसे तुमने अपवित्र
घोषित कर दिया
तिल-तिल जल रहा है
तुम्हें रोशनी देने के लिए।
किंतु इतना याद रखो
जिस रोज़ इंकार कर दिया
दीया बनने से
मेरे जिस्म ने
अँधेरे में खो जाओगे
हमेशा-हमेशा के लिए।
By Nayi Dhara Radioदिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि
कच्चे घर में
जलते दीए की रोशनी पर
क़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।
लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।
जो पर्त दर-पर्त
कालिख पोत रहा है
दीवार पर,
नीचे गहरा अँधेरा है
जिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैं
हज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।
मेरी पिंडलियों
और भुजाओं के माँस से बनी हैं बाती
हड्डियों को निचोड़कर
निकाला गया है तेल।
अँधेरे में,
कालिख पुता मेरा जिस्म
जिसे तुमने अपवित्र
घोषित कर दिया
तिल-तिल जल रहा है
तुम्हें रोशनी देने के लिए।
किंतु इतना याद रखो
जिस रोज़ इंकार कर दिया
दीया बनने से
मेरे जिस्म ने
अँधेरे में खो जाओगे
हमेशा-हमेशा के लिए।