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एक ख़्वाहिश । सेवक नैयर
और मैं सोचता हूँ
यूँही
उम्र भर
एक कमरे में
शतरंज की मेज़ पर
तुम मुसलसल मुझे
मात देती रहो
मैं मुसलसल यूँही
मात खाता रहूँ
अपनी
तक़दीर पर
मुस्कुराता रहूँ
By Nayi Dhara Radioएक ख़्वाहिश । सेवक नैयर
और मैं सोचता हूँ
यूँही
उम्र भर
एक कमरे में
शतरंज की मेज़ पर
तुम मुसलसल मुझे
मात देती रहो
मैं मुसलसल यूँही
मात खाता रहूँ
अपनी
तक़दीर पर
मुस्कुराता रहूँ