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गीता महायज्ञ के चौथे दिन गीता के दूसरे अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि यह सांख्य योग नामक अध्याय पूरी गीता का सार है। इनके ७२ श्लोकों में गीताचार्य हमें बताते हैं एक जीव की पूरी आध्यात्मिक यात्रा भले अल्पता जनित शोक से प्रारम्भ हो, लेकिन यह स्थित-प्रज्ञ की मुक्ति में समाप्त होनी चाहिए। यह ही इस अध्याय का खाका है। इस अध्याय को हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं। १. अर्जुन की शरणागति, २. जीवन के सबसे उत्कृष्ट आत्मा-ज्ञान रुपी लक्ष्य की चर्चा, ३. ज्ञान के लिए मन को तैयार करने हेतु कर्म का योगदान, और ४. स्थित-प्रज्ञ के लक्षणों की चर्चा। इन सभी के बारे में पूज्य स्वामीजी ने संक्षेप में चर्चा करी।
By Vedanta Ashramगीता महायज्ञ के चौथे दिन गीता के दूसरे अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि यह सांख्य योग नामक अध्याय पूरी गीता का सार है। इनके ७२ श्लोकों में गीताचार्य हमें बताते हैं एक जीव की पूरी आध्यात्मिक यात्रा भले अल्पता जनित शोक से प्रारम्भ हो, लेकिन यह स्थित-प्रज्ञ की मुक्ति में समाप्त होनी चाहिए। यह ही इस अध्याय का खाका है। इस अध्याय को हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं। १. अर्जुन की शरणागति, २. जीवन के सबसे उत्कृष्ट आत्मा-ज्ञान रुपी लक्ष्य की चर्चा, ३. ज्ञान के लिए मन को तैयार करने हेतु कर्म का योगदान, और ४. स्थित-प्रज्ञ के लक्षणों की चर्चा। इन सभी के बारे में पूज्य स्वामीजी ने संक्षेप में चर्चा करी।