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गीता महायज्ञ के १०वें दिन गीता के अक्षरब्रह्म योग नामक ८वें अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के कुछ प्रश्नो से होता है - की ब्रह्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म क्या होते हैं? उसका अंतिम प्रश्न है की अंतिम समय में व्यक्ति आपका समरण कैसे कर सकता है? भगवान् ने इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रदान करे। अंतिम प्रश्न का उत्तर ज्यादा विस्तार से दिया। उसके अंतर्गत उन्होंने अंतिम समय की एक विशेष ध्यान की प्रक्रिया बताई, विविध प्रकार की मरणोपरांत गतियाँ बताई और ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति का आशय भी बताया - जब सब आवागमन समाप्त हो जाता है।
By Vedanta Ashramगीता महायज्ञ के १०वें दिन गीता के अक्षरब्रह्म योग नामक ८वें अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के कुछ प्रश्नो से होता है - की ब्रह्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म क्या होते हैं? उसका अंतिम प्रश्न है की अंतिम समय में व्यक्ति आपका समरण कैसे कर सकता है? भगवान् ने इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रदान करे। अंतिम प्रश्न का उत्तर ज्यादा विस्तार से दिया। उसके अंतर्गत उन्होंने अंतिम समय की एक विशेष ध्यान की प्रक्रिया बताई, विविध प्रकार की मरणोपरांत गतियाँ बताई और ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति का आशय भी बताया - जब सब आवागमन समाप्त हो जाता है।