श्री गीता जी के १८ अध्याय के ६४, ६५, ६६ श्लोक
श्री भगवान : 'तू मेरा भक्त हो जा, मुझ में मन वाला हो जा, मेरा पूजन करने वाला हो जा और मुझे नमस्कार कर, ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त हो जाएगा यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है'
श्री भगवान : ' संपूर्ण धर्म का आश्रय छोड़कर तू एक मेरी शरण आज मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा चिंता मत कर'
कम नहीं छोड़ना है कर्म का आश्रय छोड़ना है , यह मत सोचना कि मेरे काम करने से जगत में कुछ हो जाएगा
ज्ञान के ऊपर होता है प्रेम
७२ वे श्लोक में भगवान अर्जुन का टेस्ट लेते हैं
गीता में मोक्ष अंतिम बात नहीं है, मोक्ष से भी आगे की बात, भागवत प्रेम, आखरी बात गीता में बताई गई है