*सब सुख से रहना चाहते हैं
* परिस्थिति बदलने की चेष्टा कर सुखी कोई नहीं होता
* अधिकतर यह चाहते हैं कि संसार की घटनाएं उनके अनुकूल होती रहे यह सभी महामूर्ख है
* जो इस इंतजार में रहते हैं कि अनुकूल परिस्थिति आ जाए तो आध्यात्मिक मार्ग में चलूं , वे कभी नहीं चल सकते
* आध्यात्मिक विकास प्रतिकूल परिस्थिति से अधिक होता है
* प्रारब्ध कोई नहीं बदल सकता
* आत्मज्ञान कहीं से आता नहीं है अज्ञान का जो भ्रम है वह मिटता है
* समय शक्ति सीमित हैं व्यर्थ की बातों से हटकर, परम उद्देश्य में लगाना है
* पूरी तरह से मन लगाकर सब कम करना, आश्रय भगवान का रखना, यह अर्थ है उसे श्लोक का १८। ६६ "सर्वधर्मन परित्यज्ञ"
* संन्यास मत ले लेना