* चेतन का पुरुषार्थ है प्रेम, भगवान से
* और प्रेम पुरुषार्थ नहीं है प्रभु से होता ही है
* प्रेम होता है अनिर्वाचनीय
* वह वाला प्रेम होता है जब अंदर से कामना वासना और आसकती बिल्कुल खत्म हो जाए
* भगवान ज्ञान के इच्छुक नहीं है, भगवान तो प्रेम के भूखे हैं
* भगवत प्राप्ति करनी नहीं है, भगवत प्राप्ति तो है। हमारी उस तरफ दृष्टि नहीं है
* भगवान की एप्रआप्ति और कुछ नहीं है उनके प्रति विमुखता है
* प्रेम की प्रार्थना भगवान से करते रहो की हे नाथ अपने चरणों का प्रेम दो