अपने जिले की चिट्ठी

हिंदी को बेचारी हिंदी ना बनाए-सेन


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*प्यारी हिंदी को बेचारी हिंदी ना बनाएं :- बालकवि मनीष कुमार सेन
ओ मां... ओ मां... जहां तक मेरा मानना है जन्म लेते ही बच्चा रोने में यही किलकारियां मारता है। फिर मरने के बाद परम सत्ता में विलीन होते हुए मानव के श्रुति पटल में राम नाम सत्य है...राम नाम सत्य हैं...। यही आवाज उसको मुक्तिधाम का मार्ग प्रशस्त करती हैं। खैर मैं आपको कोई उपदेश या प्रवचन नहीं दे रहा। बस अपने हिय की बात कह रहा हूँ। जन्म के समय ओ मां... ओ मां... और मृत्यु पर्यंत राम नाम सत्य है... जो सुना है यह सब जिस भाषा का है उसी भाषा से आज जीवन जीते समय कई लोग खीज उठते हैं। और पाश्चात्य संस्कृति में रची बसी भाषा के उपयोग से स्वयं को पढ़ा लिखा मानते हैं। जरा आप ही बताइए क्या केवल पाश्चात्य देशों से प्रभावित होकर मोम, डेड जैसे बोल बोलना ही पढ़ा लिखा होने का प्रमाण है तो फिर हम जैसे सीधा-साधा जीवन जीने वाले, स्याही कागज पर मरने वाले और दिन में कई बार दीदी-दीदी रटने वाले तो भैया अनपढ़ ही रह गए। यही ज्यादा पढ़ा लिखा और कम पढ़ा लिखा होने की सोच ने मेरी प्यारी हिंदी को बेचारी हिंदी बना डाला। क्योंकि जो पाश्चात्य देशों से प्रभावित भाषा का इस्तेमाल कर स्वयं को पढ़ा लिखा मानते हैं वह तो हिंदी को नकारा मानते ही हैं। और फिर हिंदी को बेचारी हिंदी कह कर टाल देते हैं। जैसे उन्होंने इसमें महारत हासिल कर ली हो।
लेकिन सच कहूं तो भले ही हम कितना ही अध्ययन कर ले लेकिन फिर भी हिंदी की कई बिंदियों से अपरिचित ही रह जाएंगे। जैसे कि मैं...। मेरा कहने का तात्पर्य यह जरा भी नहीं है कि हिंदी कठिन है और पाश्चात्य देशों वालों मैं यह भी नहीं कहता कि हिंदी बहुत सरल है कि तुम कहो बेचारी हिंदी। अरे मेरी हिंदी के तो क्या कहने...! तुम भी आओ तो यह तुम्हें भी खुद में समाहित कर लेगी और तुम खुद को इसमें समाहित कर दो। फिर देखो जीवन जीने का मजा। क्योंकि हिंदी में तो समाहार करने की शक्ति निहित हैं। अब क्या कहूँ...।
हिंदी तो एक अथाह सागर की भांति हैं जो स्वयं में ब्रज, अवधि, राजस्थानी जैसी कई भाषा रूपी छोटी-बड़ी नदियों को स्वयं में समाहित कर समूचे भारत देश सहित कई राष्ट्र-राज्यों में प्रवाहित होती हैं। ऐसी अनुपम, बेजोड़ और अद्भुत है मेरी हिंदी।
खैर सब छोड़िए मुझे तो खुशी है कि आज भी मेरे देश में हिंदी का बोलबाला है और सरकार ने भी इसे राजभाषा का दर्जा दे रखा है। बस जनमानस के मन में भी इसे सबसे ऊंचा दर्जा मिल जाए। और फिर कोई इसे बेचारी हिंदी ना कहे। बस! कहे तो हमारी प्यारी हिंदी।
बालकवि मनीष कुमार सेन*
( कवि एवं साहित्यकार)
सरड़ा, जिला- झालावाड़ (राज.)
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अपने जिले की चिट्ठीBy Balbahadur Singh