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(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
अन्दाजा ना था
हमको इस बात का कोई अन्दाजा ना था
हम अकेले चलेगे ऐसा भी किया कोई वादा ना था
उनको छोड़ने का भी मेरा कोई इरादा ना था
साथ छोड़ेंगे ऐसा भी किया कोई वादा ना था
उसकि नादानीया अक्सर परेसान करती रही
वो कितनी अंजान थी कितनी नादान थी
मै सुलझाता रहा वो उलझती रही
उसकि उलझने कुछ ज्यादा ही बढती गयी
वो ना चाही सुलझना ना मै सुलझा सका
बात इतनी बढ़ी कि ना उलझा सका
वो खुद से अंजान थी कितनी नादान थी
लोग फ़ायदा भी उसका उठाते गये
जो खीची लाईन थी उसको खाई बनाते गये
वो अक्सर जीतकर हमसे मुस्कुराती रही
मै अक्सर हारकर खुशी को मनाता गया
चाल ऐसी गजब कि वो मेरे चली
मै समझ के भी अंजान बनता रहा
वो प्यादा चलती रही मै वजीर कटता गया
वक्त का दौर ऐसा गजब का चला
खेल खुद ही मे खुद का गजब का चला
ना वो चौसर रहाना वो प्यादा रहा
ना फिर से खेलने का कोई इरादा रहा
By Sharad Dubey(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
अन्दाजा ना था
हमको इस बात का कोई अन्दाजा ना था
हम अकेले चलेगे ऐसा भी किया कोई वादा ना था
उनको छोड़ने का भी मेरा कोई इरादा ना था
साथ छोड़ेंगे ऐसा भी किया कोई वादा ना था
उसकि नादानीया अक्सर परेसान करती रही
वो कितनी अंजान थी कितनी नादान थी
मै सुलझाता रहा वो उलझती रही
उसकि उलझने कुछ ज्यादा ही बढती गयी
वो ना चाही सुलझना ना मै सुलझा सका
बात इतनी बढ़ी कि ना उलझा सका
वो खुद से अंजान थी कितनी नादान थी
लोग फ़ायदा भी उसका उठाते गये
जो खीची लाईन थी उसको खाई बनाते गये
वो अक्सर जीतकर हमसे मुस्कुराती रही
मै अक्सर हारकर खुशी को मनाता गया
चाल ऐसी गजब कि वो मेरे चली
मै समझ के भी अंजान बनता रहा
वो प्यादा चलती रही मै वजीर कटता गया
वक्त का दौर ऐसा गजब का चला
खेल खुद ही मे खुद का गजब का चला
ना वो चौसर रहाना वो प्यादा रहा
ना फिर से खेलने का कोई इरादा रहा