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(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
चलो एक बार फिर से हम नयी शुरुआत करते हैं
बीती हुई बातों पर फिर ना हम कोई बात करते हैं
अस्सी का वो घाट जहां से BHU कि बातें करते है
वापस फिर से मिलों ना अस्सी नयी कहानी करते हैं
जाड़ों कि उन रातों में जब चाय पर निकला करते थे
आते थे लक्सा पर अक्सर चायोस में जाया करते थे
चाय पीने के नाम से घंटों चायोस में बिताया करते थे
चलो एक बार फिर से हम नयी शुरुआत करते हैं
बीती हुई बातों पर फिर ना हम कोई बात करते हैं
शयन आरती पर भोले का दर्शन हम पाया करते थे
आरती से पहले हम अक्सर भष्म लगाया करते थे
शकुन को लेकर फिर हम साथ ही आया करते थे
फिर से वही घाट किनारे पहुंच हम जाया करते थे
अस्सी घाट पर अक्सर हम गप्पे लड़वाया करते थे
उन गप्पो में अक्सर लंबा व्यक्त गंवाया करते थे
चलो एक बार फिर से हम नयी शुरुआत करते हैं
बीती हुई बातों पर फिर ना हम कोई बात करते हैं
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
एक झूठे समाज का भ्रम
ये झूठे समाज को कब तक सम्भाल पाओगे
व्यक्त गुज़रता रहा तो क्या तुम बच पाओगे
मत भूलो ये व्यक्त भी जब सवाल पूछेगा
उसका जवाब कैसे समाज पर छुपाओगे
कब तक झूठी शान को लेकर चल पाओगे
हिली नीव तो तुम कब तक फिर बच पाओगे
जिन झूठे ख्वाबों में समाज का भ्रम पाले हो
पिज़रे में ये भ्रम रखकर तुम चल पाओगे
जिसको समाज कहकर भ्रम पाले रखे हो
छोड़ गए गर अपने समाज से क्या पाओगे
यही समाज जिसका भ्रम तुम पाले बैठे हो
हाथ फैलाकर देखो खाली वापस आओगे
बैठो अकेले खुद से सवाल करो तो पाओगे
समाज के आडम्बर में खुद को अकेला पाओगे
कितने लोगों को अक्सर तुमने देखे भी देखे होंगे
व्यक्त गुज़र जाते ही अपनों पर रोते होंगे
कब तक तुम इन बातों पर व्यक्त गवाते होगे
सोचो समाज के चलते कितने को खोते होंगे
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
किसी ने ऐसे ही ना शहर बसाया होगा
समाज से ऐसे ही ना जान छुड़ाया होगा
अपनों से निकलने का खोजा तरीका होगा
फिर टूट कर के अपनों से निकल पाया होगा
जिनको घमंड था हक दिखाने का उसपर अक्सर
इतनी आसानी से कैसे उनसे मुह मोड़ पाया होगा
किसी ने ऐसे ही ना शहर बसाया होगा
समाज से ऐसे ही ना जान छुड़ाया होगा
बीती बातें हिला देती होंगी उसको अंदर से अक्सर
जब झूठे समाज के डर से कुछ ना कर पाया होगा
अकेले नहीं बैठ पाता होगा यूंही जब वो अक्सर
अपनी बातों में खुद को उलझा हुआ पाया होगा
किसी ने ऐसे ही ना शहर बसाया होगा
समाज से ऐसे ही ना जान छुड़ाया होगा
लोग कहते थे पैसे पर बदल जाते हैं लोग अक्सर
किसी को कैसे बताए समाज ने सब कुछ करवाया होगा
सब रास्ते बंद कर दिए होंगे समाज के नाम पर तुमने
परेसा हो आखिरी व्यक्त में उसने ये कदम उठाया होगा
किसी ने ऐसे ही ना शहर बसाया होगा
समाज से ऐसे ही ना जान छुड़ाया होगा
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
औपचारिक रहा ना वो कल चाहिए था
सफर के लिए हम सफर चाहिए था
चले संग हमारे वो मन चाहिए था
रहीं जो खुशी वो हर पल चाहिए था
कुछ सोचा जो पल चाहिए था
औपचारिक रहा ना वो कल चाहिए था
सफर के लिए हम सफर चाहिए था
चले जो सफर में वो हम सफर चाहिए था
रहे संग जो साथी वो पल चाहिए था
गुज़रा जो बचपन वो कल चाहिए था
बीते लम्हों के बचपन का कल चाहिए था
औपचारिक रहा ना वो कल चाहिए था
सफर के लिए हम सफर चाहिए था
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
कल रास्ते मे एक बात हुई थी
एक घटना मेरे साथ हुई थी
फिर रास्ते मे मुलाकात हुई थी
एक अजनबी से बात हुई थी
शाम भी फिर से ढली हुई थी
रात भी हल्की चढ़ी हुई थी
ओस कि बूंदे पडी हुई थी
उदासी आकर खड़ी हुई थी
अस्सी घाट पर खड़ी हुई थी
बात भी हमसे चली हुई थी
बात चली कुछ लंबी ही थी
रात कटी कुछ लंबी ही थी
रात मे सब कुछ बात हुई थी
कैसे वो मुलाकात हुई थी
खुशी कि जब वो बात हुई थी
उसकी जब उससे बात हुई थी
घाट किनारे जब वो मिली थी
वादों कि फिर झड़ी लगी थी
वो रात सुहानी पडी हुई थी
याद फिर ताजा पडी हुई थी
बात जो फिर से खुली हुई थी
कल रास्ते मे एक बात हुई थी
एक घटना मेरे साथ हुई थ!
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
कल फिर से बारिश आई थी
कुछ यादे वो संग लाई थी
यादों का कोना आया था
कुरेद कर यादे लाया था
तुम फिर ना आने वाली थी
यादे खाली ही लाया था
कल फिर से बारिश आई थी
कुछ यादे वो संग लाई थी
बोला था कुछ यादे भी थी
संग में वो बातें भी थी
वादों कि भरमार पडी थी
वो बोली कुछ याद पडी थी
कल फिर से बारिश आई थी
कुछ यादे वो संग लाई थी
यादें कुरेद कर जब देखा था
ताजा यादें अब भी प़डा था
बारिश को तो फिर आना था
यादों को फिर धूल जाना था
कल फिर से बारिश आई थी
कुछ यादे वो संग लाई थी
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