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(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
किसी के पास करने को काम ना हो
किसी के काम के करने का अंजाम ना हो
दिशाहीन रास्तो से अक्सर निकल जाते हो
अक्सर खुद को रास्तो में भटका पाते हो
नया रास्ता देखकर जब वो बदल जाते हो
कुछ दूर चलकर खुद को ठगा सा पाते हो
तब लोग तो कहेंगे ना कितने बदल गए हो तुम
हर बार रास्तो से खुद को भटका पाते हो
घनघोर अंधेरे में जब वो सो जाते हो
सुबह के इंतजार में जब वो व्यक्त बिताते हो
सुबह होने पर जब कई रास्ते नजर आते हो
हर दिन वो फिर अलग रास्ते पर जाते हो
हर बार सफल होने का नया रास्ता अपनाते हो
फिर शाम होने पर वही रुक जाते हो
आपको जब सफल हुआ पाते हो
तब लोग तो कहेंगे ना कितना बदल गए हो तुम
अक्सर हमारी उनकी जब बात हुआ करती थीं
बड़ी सुहानी अक्सर वो रात हुआ करती थीं
दूर शहर में रहकर कितना पास हुआ करते थे
कितने हसीन वो ज़ज्बात हुआ करते थे
कितनी थी आसपास वो बात हुआ करती थी
दुनिया कि ऐसी कोई ना बात हुआ करती थीं
अक्सर हमारी उनकी जब भी बात हुआ करती थीं
बड़ी सुहानी वो अक्सर रात हुआ करती थीं
जिम्मेदारियों के ना वो साथ हुआ करती थीं
करते थे कुछ भी हम प्लान बनाया करती थी
उड़ती थी सारी सैलरी जब हम घूमने जाया करते थे
ना थी कोई समस्या ना ही कोई फ़िक्र थी
ना थी कभी उदास ना उसका कोई जिक्र था
व्यक्त ऐसा बदला हम भी बदल चुके थे
जिम्मेदारियों में वो भी ऐसे खो चुके थे
ना बातें थी पुरानी ना तुम ही वही थे
अक्सर हमारी उनकी जब बात हुआ करती थीं
बड़ी सुहानी अक्सर वो रात हुआ करती थी
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
याद है या फिर भूल गई मैं आजा याद दिलाता हु
बारिश में हुई पहली मुलाकात की याद ताजा कराता हु
याद है आफ़िस के वो दिन जब साथ में आया करते थे
बारिश का बहाना करके अक्सर लेट हो जाया करते थे
जब होती थी नोक झोंक अच्छे से हमे सुनाती थी
एक दूसरी कि खामोशी में हफ्तों व्यक्त गवाती थी
होती थी अपनी बातों में वो हमे समझाया करती थी
बातों ही बातों में कसमें वादे भी निभाया करती थी
कभी कभी जब खो जाने का डर सताया करता था
रात मे खुद जाग जाग कर हमे सुलाया करती थी
याद है या फिर भूल गई मैं आजा याद दिलाता हु
बारिश में हुई पहली मुलाकात की याद ताजा कराता हु
सुना है बारिश आज हुई शहर वालों को कहते हुए
बारिश पहली बार हुई शहर वालों को कहते हुए
पहली बारिश मे आने का वादा करवाया करती थी
सुना है तुम हमको छोड़ गयी शहर वालों को कहते हुए
छोड़ कर कहीं और गयी शहर वालों को कहते हुए
याद है या फिर भूल गई मैं आजा याद दिलाता हु
बारिश में हुई पहली मुलाकात की याद ताजा कराता हु
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
छोड़कर मैं तुम्हारा शहर जा रहा हूं
ना जाने कितनी यादों से ग़म जा रहा था
था यादों मे खोया ना मन जा रहा था
जिंदगी बेहतर बनाने को मैं जा रहा था
नयी पारी कि अब नयी शुरुआत करनी थी
जो बिता अब उस पर ना कोई बात करनी थी
जिंदगी कि अब नयी शुरुआत करनी थी
अब अकेले सफर में खुद से बात करनी थी
मुसाफिर थे हम भी मुसाफिर थे वो भी
नए मुसाफिरों के साथ नयी मुलाकात करनी थी
अब अंजान शहर में अकेले खुद से बात करनी थी
छोड़कर कर अकेला मैं तेरा शहर आया था
उठाकर के कुछ यादे मैं संग लाया था
ये सफर भी कुछ अनजाना सफर था मेरा
मैं अक्सर उन यादों के भंवर में रहा
मैं अक्सर उन यादों के सफर में रहा
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
तुम न आये थे
बीत गया बसंत मगर तुम न आये थे
बदला मौसम का रंग मगर तुम न आये थे
मै रहा मौसम के संग मगर तुम न आये थे
सूखा सूखा बीता मौसम मगर तुम न आये थे
पतझड़ का मौसम भी हमसे मिलने आया था
वो रहा हवा से तंग मगर फिर भी आया था
संग हवा के झोके भी अपने वो लाया था।
हवा भी तेरी तरह ही चलकर ही आयी थी
रुकी नहीं पर मौसम पतझड़ कर आयी थी
आते तो अच्छा होता पर तुम न आये थे
खुशियो के खुले भण्डार न तुम भर पाए थे
सावन के पहले अक्सर पतझड़ आते थे
मौसम को वो अक्सर झटका दे जाते थे
सावन आखिरी बार न जाने कब रोया था
बसंत कि बहार में न जाने कब खोया था
बीत गया बसंत मगर तुम न आये थे
बदला मौसम का रंग मगर तुम न आये थे
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
शाम आज फिर आयी होगी
ऑफ़िस मे वक्त गवायी होगी
बोली थी वो साथ आयेगी
आकर घाट पर वो जायेगी
हमको यूँ तो चलना ही था
मन का यूँ तो मचलना ही था
शाम आज फिर आयी होगी
ऑफ़िस मे वक्त गवायी होगी
उसका शहर मै छोड़ आया था
अपनी यादे मै साथ लाया था
बनारस कि जो तंग गलियाँ थी
फिर ना मिलेंगी जो सखिया थी
घाट पर शाम का मिलना जो था
कुछ लोगो का बिछडना जो था
शाम आज फिर आयी होगी
ऑफ़िस मे वक्त गवायी होगी
शाम आज फिर आयी होगी
घाट पर जमावड़ा लगायी होगी
ऑफ़िस कि कैसी मजबुरी थी
नौकरी ने बनारस छुडवाई थी
शाम आज फिर आयी होगी
ऑफ़िस मे वक्त गवायी होw!
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
एक घाट सुहाना अपना था
चुना जो हमने सपना था
हम अक्सर जाया करते थे
सपने बुनकर लाया करती थी
हर शाम कि यही कहानी थी
हर बाते जानी पहचानी थी
वो कालेज वाली बाते थी
वो आर्ट कैम्पस से आती थी
मै साईंस से आ जाता था
गेट पर मुलाकात हो जाती थी
फिर जिमखाना के चक्कर लगवाती थी
फिर घाट घुमाने जाती थी
घण्टों फिर वहा बिताती थी
घाट पर एक चाय वाला था
वो कुछ जाना पहचाना था
हर दिन उसकि बात हुई
सीढियो पर उससे मुलाकत हुई
वो अक्सर हाय आ जाता था
बिन मागे चाए पिलाता था
वो कालेज वाली बाते रही
जो घाटो तक चलकर साथ रही
कालेज के दिन अब ना साथ रही
अब हमारी उसकि ना मुलाकत रही
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
फिर से बसंत आया
आज फिर से बसंत आया था
साथ पुरानी यादे लाया था
आज फिर से बरसात हुई थी
बसंत कि शुरुआत हुई थी
पिछले बसंत जब तुम आयी थी
तब भी तो बरसात हुई थी
याद है या फिर भुल गई तुम
अपनी कितनी बात हुई थी
आज बसंत वापस आया था
अपनी कुछ यादे लाया था
यादो मे तुम फिर आयी थी
कितनी तुम खुशिया लाई थी
घाट आज भी जगमग ही थे
दशास्वमेघ पर बैठे हम थे
शाम हुई फिर शुरु आरती थी
खोजा मगर आज ना तुम थी
लोग जलाते रहे जो दिपक
यादों मे खो गये तुम तब तक
मै फिर उदास वापस आया था
समय को लेकर पछताया था
वक्त भी जो गुजर चुका था
शहर भी अपना बदल चुका था
हाथ ना कुछ लगने वाला था
बसंत भी अब बदल चुका था
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
बसंत कि मुलाकत
एक बात बताओ क्या तुम आयी थी !
बीते बसंत कि खुशियाँ फिर से लाई थी !!
सुना अशोका मे आज प्लेसमेंट हुआ था !
नौकरी के चक्कर मे तुम कालेज आयी थी!!
सुना है झोली भरके तुम खुशियाँ लाई थी!
इंतजार करते करते पतझड बीच चुका था!!
बसंत के आने मे अब तो देर नही थी!
तुमको कोई और मिला था क्या इस बसंत मे !!
क्या तुम वादे अपने भुलने अशोका आयी थी!
या फिर बसंत कि बहार का इंतजार लाई थी
आज अशोका मे उससे मुलाकात हुई थी !
घण्टो बैठी थी जब मेरी बात हुई थी!!
बातो ही बातो मे सब कुछ बोल गई थी!
अपनी यादो कि गठरी को खोल गयी थी !!
देख के चेहरे को ऐसा एहसास हुआ था !
जैसे बसंत कि हरियाली मे कोई पेड़ झड़ा था !!
क्या कोई मिला था तुमको इस बीते पतझड मे !
या फिर बसंत कि बहार मे कोई छोड़ गया था w!
(अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है !
एकअलग ब्रम्हाण्ड है
ये एक अलग ब्रम्हाण्ड है बनारस जो उसका नाम है!
जहा केवल झुकि मन्दिर गंगा मे पायी जाती हो !!
जहा मन्दिरों से स्वयं मिलने गंगा भी आती हो !
जहा मोच्छ कि कामना लेकर के यहा पर आते हो !!
मोच्छ पाने के लिये आकर यहा बस जाते हो !
ये एक अलग ब्रम्हाण्ड है बनारस जो उसका नाम है!!
जहा घाटो कि शृँखला मे आरती सुनाती हो !
जहा दिपको कि शृँखला से शाम चलकर आती हो !!
जहा आरती के नाम पर घाटो पर जनता आती हो!
सुबह घाटो से नया अनुभव करवाती हो !!
ये एक अलग ब्रम्हाण्ड है बनारस जो उसका नाम है!
सुबह और शाम घाटो से ही जानी जाती हो !!
शाम होते ही लोग घाटो तक टहलने आते हो !
नाविक नाव पर मरने का सुख बतलाते हो !!
इस शहर को गायक ज़िन्दा शहर बतलाते हो !!
जहा घाटो के नाम कि शृँखला पर फिल्म बनाते हो !
ये एक अलग ब्रम्हाण्ड है बनारस जो उसका नाम है!i
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