अल्हड बनारसी

अल्हड बनारसी

By Sharad DubeyMusicMusic Commentary
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अल्हड बनारसी episodes

  • जब बैठे अकेले घाट पर

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    जब बैठे अकेले घाट पर 

    जब हो आखिरी रात पर 

    शहर में ना हो मुलाकात पर 

    मिलना तुम हमसे घाट पर 

    करना आखिरी बात पर 

    होगी बात हमारी घाट पर 

    जब बैठे अकेले घाट पर 

    जब हो आखिरी रात पर 

    ना मिलेंगे हम उस बात पर 

    मिले ना फिर मुलाकात पर 

    ऐसी ना हो वो रात पर

    गुज़री जो हम पर बात पर 

    जब बैठे अकेले घाट पर 

    जब हो आखिरी रात पर

    लौट आना तुम मेरे पास पर 

    खोजना तुम हमको घाट पर 

    ना होगी पुरानी बात पर 

    चलेगे हम नयी राह पर 

    जब बैठे अकेले घाट पर 

    जब हो आखिरी रात पर 

    भूलकर पुरानी बात पर 

    रिस्तों कि शुरूआत पर 

    फिर से करे हम बात पर 

    मिले जब हम आखिरी रात पर 

    जब बैठे अकेले घाट पर 

    जब हो आखिरी रात पर

    2 min
  • आज फिर सोमवार आया होगा

    आज फिर सोमवार आया होगा 

    आफ़िस का रूख अपनाया होगा 

    नयी नयी जो ऑफिस होगी 

    नये नये फिर लोग मिलेंगे 

    नयी नयी कुछ बातें होंगी 

    यूं ही कटी कुछ रातें होंगी 

    सब कुछ नया नवेला होगा 

    फिर वही पुराना रेला होगा 

    कुछ लोग नये फिर मिलते होंगे 

    बातें कुछ यूं ही चलते होंगे

    कुछ लोगो से जब बातें होंगी 

    गुज़री हुई जब रातें होंगी 

    जिक्र गुजरकर जब आएगा

    याद भी जब मेरा आएगा 

    जिक्र से तुम कतराती होगी 

    आफ़िस का रूख अपनाती होगी 

    बातों से जब तुम आती होगी 

    बात बदल कर जाती होगी 

    नए नए कुछ लोग मिलेंगे 

    नयी नयी कुछ बातें होंगी

    2 min
  • बरसातें फिर आने वाली है

    बरसातें फिर आने वाली है !

    यादे फिर लाने वाली है !!

    ऑफिस कि बातें नहीं रहीं!

    वो शाम कि यादे नहीं रहीं !!

    इस बार जब बारिश आयेंगी !

    हमको शहर में ना पाएँगी!!

    बूंदे फिर किसको भीगोयेगी !!

    कुछ वो ज़ज्बाते नहीं रहीं 

    वो शहर भी अपना नहीं रहा!

    हम साथ भी अब तो नहीं रहे!!

    अब याद भी आकर चली गयी !

    एक रात थी आकर चली गयी !!

    एक बरसात फिर आने वाली है !

    कुछ याद दिलाने वाली है!!

    तुम फिर आओगे पता नहीं!

    यादे लाओगे पता नहीं 

    एक बात दिलाने वाली है

    बरसातें फिर आने वाली है !

    यादे फिर लाने वाली है !!

    2 min
  • सोचो फिर तुम सही थे क्या

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    जो सोच बनाए बैठे थे 

    सोचो फिर तुम सही थे क्या 

    जिन बातों को लेकर बैठे थे 

    उन बातों पर खुद सही थे क्या 

    सुना किसी से कहा किसी ने 

    जो समझा तुम सही थे क्या 

    फर्क़ नहीं पड़ता क्या सोचा 

    फिर भी बतलाओ सही थे क्या 

    इल्ज़ाम तो हम पर लगा दिया 

    तुम खुद सोचो तुम सही थे क्या

    जिन लोगों कि बातों में जाते हो 

    तुम खुद बतलाना वो सही थे क्या 

    जो सोच बनाए बैठे थे 

    सोचो फिर तुम सही थे क्या

    2 min
  • कितनी सुहानी रात थी

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    कितनी सुहानी रात थी 

    उस रात हुई बरसात थी

    अपना शहर कि बात थी 

    हुई जो वो मुलाकात थी 

    मिले थे हम उस शहर में 

     कहने को कितनी बात थी 

    पहली जो वो मुलाकात थी

    कहने को कितनी बात थी 

    शहर हमको जानता था 

    लगा हर कोई पहचाना था 

    पहचानते थे हम भी उसको 

    ना पता ये कोई जानता था 

    कितना वो जाना शहर था 

    अपना पहचाना शहर था 

    हर गली से पहचान थी 

    हम मिले थे जब इस शहर में 

    एक अजीब इत्तफाक था 

    मिलने का पहला व्यक्त था 

    जानना भी एक अभिव्यक्त था 

    वो एक अजीब सी बात थी 

    कितनी सुहानी रात थी



    2 min
  • उस रात भी कोई आया था

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    उस रात भी कोई आया था 

    हस कर के हमें बुलाया था 

    मैं था कुछ ऐसा फसा हुआ 

    मैं उनसे ना मिल पाया था 

    पायी थी मैंने एक झलक 

    गुज़री जब वो मुझसे होकर 

    सोचा फिर ना रुक पाया था 

    चलना था ना चल पाया था 

    जो हुआ ना होने वाला था 

    जो गुज़रा व्यक्त हमारा था

     वो एक सपने से भी प्यारा था

     ना व्यक्त मिला ना व्यक्त किया

     मिलने का ख्वाब हमारा था 

    जो एक सपने सा प्यारा था 

    उस रात भी कोई आया था

     हस करके हमे बुलाया था

    2 min
  • एक इंतजार था बेहतर कल के लिए

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    एक इंतजार था बेहतर कल के लिए 

    एक प्रयास था बेहतर कल के लिए

    हम मिले घाट पर बेहतर कल के लिए

    गुजारा वक्त रात भर बेहतर कल के लिए

    कितने सपने दिखाए बेहतर कल के लिए 

    हम दोबारा फिर से आए बेहतर कल के लिए 

    फिर जब राते हुई मुलाकाते हुई बेहतर कल के लिए 

    गुजारा कल का सफर रहा जो बेहतर कल के लिए 

    मन में एक आस था बेहतर कल के लिए 

    एक अलग प्रयास था बेहतर कल के लिए 

    हमने जो भी किया जिंदगी भर के लिए 

    ना मिले हम डोनर फिर कल के लिए 

    कल का इंतजार था जिंदगी भर के लिए 

    ना मिले फिर दोबारा एक दो पल के लिए 

    एक सफर था हमारा जिंदगी भर के लिए 

    एक इंतजार था बेहतर कल के लिए 

    एक प्रयास था बेहतर कल के लिए

    हम मिले न दोबारा जिंदगी भर के लिए

    2 min
  • आज एक बार उसको भी मेरी याद तो आई होगी

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    आज एक बार उसको भी मेरी याद तो आई होगी

    किसी और के हाथों ने जब उसको रंग लगाई होगी

    फिर से घाटों तक वो चलकर के आई होगी

    चिता भस्म कि होली देख पछताई होगी

    रही अकेले खड़ी याद उसको भी तो आई होगी

    नाव पकड़ कर वो अकेली क्या चल पाई होगी

    या फिर घाट पर खेल होली फिर आई होगी 

    BHU के सारे बच्चे भी तो आए होंगे

    होली का माहौल को फिर वो बनाएं होंगे

    शाम का अपना एक अलग माहौल जो होगा

    उस बदले माहौल में वो ढल पाई होगी

    या फिर उसको याद फिर मेरी आई होगी

    आज शाम कि आरती अलग माहौल जो होगा

    लिए गिटार BHU के बच्चे जो वो आए होंगे

    वो भी अपना अलग माहौल जमाए होंगे

    आज एक बार उसको भी मेरी याद तो आई होगी

    किसी और के हाथों ने जब उसको रंग लगाई होगी

    2 min
  • एक बदलाव तुम्हारा था

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    एक बदलाव तुम्हारा था 

    जब बैठे थे हम राज घाट पर वो फैसला तुम्हारा था

    मिलते थे अक्सर शाम जो वो फैसला तुम्हारा था

    बीती बातों को लेकर ढोने का वो फैसला तुम्हारा था

    हर बार पुरानी बातो पर रोने का वो फैसला तुम्हारा था

    मिलने और फिर मिलकर बिछड़ने का वो फैसला तुम्हारा था

    हुई जो सारी जो बाते वो सारा दाव तुम्हारा था

    जिसे तुम पराया कहते हो वो फैसला तुम्हारा था

    ना अगर कर सके इंतजार तो वो फैसला तुम्हारा था

    आज भी आई वही शाम ना आने का फ़ैसला तुम्हारा था

    आज भी हम है उसी जगह जिस पर कल हक तुम्हारा था 

    छोड़कर हमको चले गए कहते हो बदलाव तुम्हारा था

    वक्त वक्त की बाते थी इस बार का वक्त तुम्हारा था 

    भूलो न वक्त भी बदलेगा फैसला जो अभी तुम्हारा था 

    हम कल भी आयेंगे यादों में संकल्प जो रहा हमारा था 

    जब बैठे थे हम राज घाट पर वो फैसला तुम्हारा था

    मिलते थे अक्सर शाम जो वो फैसला तुम्हारा था

    3 min
  • कोई फिर ना आया अकेले अकेले

    (अल्लहड़ बनारसी और रमती बंजारन) जिसके (लेखक शरद दुबे) और (वक्ता RJ रविंद्र सिंह) है  !

    शाम ढ़लने को आयी अकेले अकेले 

    कोई फिर ना आया अकेले अकेले 

    ना भरोसा जताया अकेले अकेले 

    ना उम्मीदी यूं छायी अकेले अकेले 

    नजर कोई ना आया अकेले अकेले 

    खुद पर ही मुस्कुराया अकेले अकेले 

    बोल कर भी ना वो आया अकेले अकेले 

    फिर बहाना बनाया अकेले अकेले 

    आज फिर खड़ा था अकेले अकेले 

    घाट फिर जगमगाया अकेले अकेले 

    आज कोई भी ना आया अकेले अकेले 

    इंतजार यूं कराया अकेले अकेले 

    दीपक यूं जलाया अकेले अकेले 

    उदास शाम आयी अकेले अकेले 

    उदासी यूं छाई अकेले अकेले 

    कोई फिर से मुस्कुराया अकेले अकेले 

    गुज़रा शहर याद आया अकेले अकेले 

    2 min

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