Pratidin Ek Kavita

Hum Na Rahenge | Kedarnath Agarwal


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हम न रहेंगे | केदारनाथ अग्रवाल 


हम न रहेंगे-

तब भी तो यह खेत रहेंगे;

इन खेतों पर घन घहराते

शेष रहेंगे;

जीवन देते,

प्यास बुझाते,

माटी को मद-मस्त बनाते,

श्याम बदरिया के

लहराते केश रहेंगे!

हम न रहेंगे-

तब भी तो रति-रंग रहेंगे;

लाल कमल के साथ

पुलकते भृंग रहेंगे!

मधु के दानी,

मोद मनाते,

भूतल को रससिक्त बनाते,

लाल चुनरिया में

लहराते अंग रहेंगे।


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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio