Pratidin Ek Kavita

Is Janam Mein | Rajula Shah


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इस जनम में । राजुला शाह


अचरज हो तुम

एक दु:स्वप्न से जग

कमरे में

अलस्सुबह

परदे उड़ाते आती

हवा-सा अचरज।

इसके आगे मगर

मुझे कुछ याद नहीं


जगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता है

सोता हूँ तो यह संसार

जाने कहाँ बिला जाता है

कभी यही भूल जाता हूँ

कि जागा हूँ या सो रहा


फिर भी

इस जनम में

तुमसे ही

बाकी सब

अपनी जगह पर है

इसलिए

मैं कहीं भी रहूँ

तुम यहीं रहना

मैं कुछ भी कहूँ

तुम यही कहना

मैं हूँ

मैं रहूँगी।


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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio