कुछ हम नज़रंदाज़ कर देते हैं
कुछ तुम रहने देते हो गफलत का शक
वरना इतने भी बेख्याल नहीं हम
अपनी मौत के बहानो से।
लोग कहते है बड़ा ढीठ है
जिए जा रहा है।
हम बेक़रार हैं कि जिला जाये कोई।
अब बातें नहीं होती
अपने भीतर के झोलों से
नाराज़ सी जिंदगी जो घूमती है
बाहर डूबती इन उम्मीदों में
कुछ समझा लेते हैं खुद को
कुछ तुम्हारी चुप्पी बुन जाती है कुछ भरम
दिल सम्हल जाता है
सांस चल जाती है।