हारी बाज़ी सी फैली रात का भूला हुआ कतरा
सहम कर कुछ आरजुए बुनता
झगड़ते हुए ये जज़्बात
मन बनाते मुक्कम्मल हो जाने का
सोचा था क़ि आज तुमको सोचेंगे
अब आरजुओं का क्या है
बेख़ौफ़ चली आती हैं
मैं रह जाता हूँ
तुम्हारी बेरुखी की काली चादर को समेटने के लिए
ये अकेलेपन के बियाबान के कटीले पेड़
तमगे हैं मेरी प्यास के कम रह जाने के
कभी रखो आबरू इन डरे हुए ख्वाबों की
अपने अजनबीपन को नफरत का नाम देकर।
कुछ मिटें
कुछ लुटें
इक बेदाम गुमशुदा सी कुर्बानी में
मतलब खोजेंगे जब अपने आवारापन को सस्ता करने का मन होगा।