हो बेज़ार राख़ पसरी
सन्नाटे के आसमानों में
कुरेदें क्यों न उसमें झीनी हँसीं के पठारों को हम
बन रहा है
थकान विरक्ति और शायद आदतों से एक मक़बरा
इसे सजायें क्यों न कुछ पैबंद मुस्कुराहटों से हम
बुझती आत्मा में
रोज़ उगते हैं नए मरुस्थल
बसाएँ क्यों न उन में कुछ बिसरे से गाँव हम
किवाड़ें दरक रही हैं
जा चुकों के न होने से
जलाएँ क्यों न उन पर कुछ नए सूने दीये हम
ग़ज़ल की लज़्ज़त
सूखने सी लगी है रोज़मर्रा के खंडहारों में
डूबें क्यों न इस पिघले नशे के तहख़ानों में हम
माना भूल से गए हैं
क्या होता है जवाँ होना
चुपके से क्यों न कर जाएँ कुछ गुनाह हम