कभी रुक कर देखो
तिलस्मी रोमानियत की ख़ुमारी के झुरमुटे को थोड़ा हटा कर ,
दिखेगा...
छोटे सच सा सलोना
सामान्य का सम्मोहन
शायर का काम है उड़ना
कहीं लुट जाना
किसी गुनाह को जी कर अमीर कर देना
मगर
एक कुफ़्र ये भी करके देखो ....
एक उम्र से तराशी
घुले मौन सी शक्ति
नदी सी उदार
भीतर तक तृप्त
शाम के सूरज सी थकी मुस्कुराहट को पढ़ के देखो
उसमें बैठा
सामान्य का सम्मोहन
उन रोज़मर्रा समझौतों से पुख़्ता
ख़ुद के दर्द को नींव में दबा कर
साँस लेता , हँसता
हज़ारों परिकथाओ से गहरा
रोज़मर्रा की सच्चाई से बना प्रेम
उफ़ ये सामान्य का कभी ना दिखने वाला सम्मोहन