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जब अख़बार से ज़्यादा हों । नीलम भट्ट
जब अख़बार से ज़्यादा हों पन्ने इश्तहारों के
तो समझो त्योहारों का मौसम आ गया...
जब रिश्तों पर हावी हो सौग़ातों का बोझ
तो समझो बाज़ार हम पर छा गया...
क्या खरीदें, कहां से, कितना और कैसे
आसान किश्तों पर खुशी खरीदने का
चलन आ गया...
By Nayi Dhara Radioजब अख़बार से ज़्यादा हों । नीलम भट्ट
जब अख़बार से ज़्यादा हों पन्ने इश्तहारों के
तो समझो त्योहारों का मौसम आ गया...
जब रिश्तों पर हावी हो सौग़ातों का बोझ
तो समझो बाज़ार हम पर छा गया...
क्या खरीदें, कहां से, कितना और कैसे
आसान किश्तों पर खुशी खरीदने का
चलन आ गया...