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ज्ञानपीठ पुरुस्कार भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान है। इस पुरस्कार का प्रस्ताव १९६१ में रखा गया था जिसके बाद १९६५ में पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था।
पहला ज्ञानपीठ पुरुस्कार मलयालम भाषा के विख्यात कवी श्री G. Sankara कुरूप को दिया गया था। श्री कुरूप को महाकवि G भी कहा जाता था। ज्ञानपीठ पुरुस्कार के अलावा उन्हें भारत भूषण, साहित्य अकादमी पुरुस्कार और केरल साहित्य अकादमी पुरुस्कार भी दिया गया था।
ज्ञानपीठ पुरस्कार के चयन की प्रक्रिया जटिल है और कई महीनों तक चलती है। इस प्रक्रिया का आरंभ विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों, अध्यापकों, समालोचकों, प्रबुद्ध पाठकों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक तथा भाषा से जुड़ी संस्थाओं के प्रस्ताव भेजने के साथ होता है। जिस भाषा के साहित्यकार को एक बार पुरस्कार मिल जाता है उस पर अगले तीन वर्ष तक विचार नहीं किया जाता है। हर भाषा की एक ऐसी परामर्श समिति है जिसमें तीन विख्यात साहित्य-समालोचक और विद्वान सदस्य होते हैं। इन समितियों का गठन तीन-तीन वर्ष के लिए होता है।
यह पुरस्कार बाईस भारतीय भाषाओं में लिखे साहित्य के लिए दिया जाता है जिनमें से अब तक सोलह भाषाओं के साहित्य के लिए दिया जा चूका है - जिनमें हिंदी, कन्नड़, बंगाली, मलयालम, गुजराती, मराठी, उड़िआ, उर्दू, असमिया, तेलुगु, पंजाबी, तमिल, कोंकणी, अंग्रेजी, कश्मीरी और संस्कृत शामिल हैं।
ज्ञानपीठ पुरुस्कार भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान है। इस पुरस्कार का प्रस्ताव १९६१ में रखा गया था जिसके बाद १९६५ में पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था।
पहला ज्ञानपीठ पुरुस्कार मलयालम भाषा के विख्यात कवी श्री G. Sankara कुरूप को दिया गया था। श्री कुरूप को महाकवि G भी कहा जाता था। ज्ञानपीठ पुरुस्कार के अलावा उन्हें भारत भूषण, साहित्य अकादमी पुरुस्कार और केरल साहित्य अकादमी पुरुस्कार भी दिया गया था।
ज्ञानपीठ पुरस्कार के चयन की प्रक्रिया जटिल है और कई महीनों तक चलती है। इस प्रक्रिया का आरंभ विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों, अध्यापकों, समालोचकों, प्रबुद्ध पाठकों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक तथा भाषा से जुड़ी संस्थाओं के प्रस्ताव भेजने के साथ होता है। जिस भाषा के साहित्यकार को एक बार पुरस्कार मिल जाता है उस पर अगले तीन वर्ष तक विचार नहीं किया जाता है। हर भाषा की एक ऐसी परामर्श समिति है जिसमें तीन विख्यात साहित्य-समालोचक और विद्वान सदस्य होते हैं। इन समितियों का गठन तीन-तीन वर्ष के लिए होता है।
यह पुरस्कार बाईस भारतीय भाषाओं में लिखे साहित्य के लिए दिया जाता है जिनमें से अब तक सोलह भाषाओं के साहित्य के लिए दिया जा चूका है - जिनमें हिंदी, कन्नड़, बंगाली, मलयालम, गुजराती, मराठी, उड़िआ, उर्दू, असमिया, तेलुगु, पंजाबी, तमिल, कोंकणी, अंग्रेजी, कश्मीरी और संस्कृत शामिल हैं।