Pratidin Ek Kavita

Kathariyan | Ekta Verma


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कथरियाँ | एकता वर्मा 


कथरियाँ

गृहस्थियों के उत्सव-गीत होती हैं।

जेठ-वैसाख के सूखे हल्के दिनों में

सालों से संजोये गए चीथड़ों को क़रीने से सजाकर

औरतें बुनती हैं उनकी रंग-बिरंगी धुन।

वे धूप की कतरनों पर फैलती हैं

तो उठती है, हल्दी और सरसों के तेल की पुरानी सी गंध।

गौने में आयी उचटे रंग की साड़ियाँ

बिछ जाती हैं महुए की ललायी कोपलों की तरह

जड़ों की स्मृतियों पर।

युगों पुरानी कथरियाँ इतरा उठती हैं, नये लिबास में।

कानों तक मोटे सूती धागे की तान उठती है।

आलापों के सीधे-आड़े टप्पे पड़ते हैं लकीरों में।

औरत के हाथ थिरकते हैं।

पृथ्वी पर उभरती हैं अक्षांश और देशांतर।

(हतभाग्य! वे भी काल्पनिक कहलायी)

घर की औरतें, भरी दोपहरी में

इन्हे धूप दिखाती हैं,

लेसती-रोपती हैं

रफू रौगन करती हैं हर साल

इस तरह वो अपना इतिहास बचाती हैं

पुरुषों के वंश लिखे जाते हैं

हरिद्वार में, पंडों के पत्तरों में

औरतों की पुरखिनें दर्ज होती हैं

घर की इन्हीं पुरानी कथरियों में।

ये कथरियाँ

मानव त्रासदियों की चश्मदीद हैं,

इन्होंने, इतिहास को सबसे नंगे क्षणों में हाफते देखा है!

उसके धब्बों में मर्सिया के आंसू सोखे हुए हैं

सलवटों में प्रार्थनाओं की ख़ाली सीपियाँ दबी हैं,

चटखती हैं रात बे-रात करवटों पर।

इनमें टॅंके हैं प्यार के नर्म क़िस्से भी

किरोसिया की चद्दर में कढ़े गुलाब की तरह, यहाँ- वहाँ।

रातों में फुसफुसाकर कही गई मुहब्बत की मीठी शायरियाँ

लाड़ में पागे गये बोसे और मनुहारों पर

रीझी थी कथरियाँ भी, बिदा होकर आयी नई-नवेली दुलहिनों के साथ-साथ

कथरियाँ ही जानती हैं,

दिन में मूँछों के नीचे दबे  रहे होंठ 

सबके सो जाने पर मुस्कुराते है,

तब;

चाँद उतरकर चारपाई की पाटी तक अता है।

ये कथरियाँ कुशल परिचायिकाएँ भी रही,

औरतों की सूजी हुई पीठों पर

धरती रही गर्म फाहे ताउम्र।

कथरियों ने भूगोल भी जाना

वे बताती हैं, औरतों ने खारे समंदरों को अपनी पीठ पर सुखाया है।

कथरी का सूखा हुआ कोना

(जहां वे आदम को थपक-थपककर सुलाती हैं,)

पृथ्वी का एक चौथाई थल है।

जिसे किन्ही नाविकों ने नही

औरतों ने अपनी हथेलियों से टटोलकर ढूँढा है।

कथरियों के पास पृथ्वी के अपने मानचित्र हैं।

यदि कोई पुरातत्वविद इनका धागा उतके,

तो मिलेगा

उनका ससुरा, मैका, पाषाण-पुरापाषाण सब।

जादुई क़ालीनों की तरह वे ले जाएँगी

इतिहास के चिन्हित युगों के और पीछे!

पूजागृह के लाल कपड़े में लपेटी किताब की तरह

औरतों को फ़ुरसत  की जिल्द न जुरी।

घोंसला बुनती बुलबुल की तरह वे गाती ही रहीं 

बुनती-बिछाती ही  रहीं ।

इसलिए समय से होड़ में

मैके की कच्ची दीवार पर छूटी हथेलियों की लाल छाप की तरह,

नाम की जगह वे बचा पायी हथेलियाँ

और कविता की जगह कथरियाँ!

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