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KHAIRTHAL KE DHAMAL


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खैरथल के धमाल में सिंध की गूंज   डॉ. जितेन्द्र लोढ़ा के लेखन में 'इतिहास की धड़कन' का अर्थ ढाटी पुष्करणा समुदाय की उस जीवंत और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (धमाल) से है, जो समय और भौगोलिक सीमाओं के पार आज भी उतनी ही सक्रिय है जितनी वह सिंध में थी 1।

स्रोतों के आधार पर इसके विस्तृत मायने निम्नलिखित हैं:

  • पुस्तकों से परे जीवित इतिहास: डॉ. लोढ़ा के अनुसार, धमाल कोई "पुस्तक में बंधा इतिहास" नहीं है, बल्कि एक जीवित अनुभव है जिसे समुदाय हर वर्ष नए उत्साह के साथ दोहराता है 2। यह इतिहास का वह रूप है जो पन्नों पर नहीं, बल्कि लोगों के आचरण और उत्सवों में धड़कता है 1, 2।
  • समय और दूरी का लोप: जब खैरथल की गलियों में वही 'ढाटी सुर' गूंजते हैं जो कभी सिंध के मिट्टी व छाछरो की चौपालों में गूंजते थे, तो ढोलक और मंजीरे की वह लय समय की दूरी को मिटा देती है 3। यही निरंतरता इसे इतिहास की धड़कन बनाती है।
  • सामूहिक चेतना का वाहक: धमाल के दौरान गाए जाने वाले गीत और भजन केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि उनमें "इतिहास की गूंज" समाहित है 4। यह समुदाय की सामूहिक स्मृति और उनकी सांस्कृतिक यात्रा का संवाहक है 3, 4।
  • विस्थापन और जिजीविषा का संगम: यह 'धड़कन' उस पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है जो विस्थापन से मिली और उस जिजीविषा (जीने की इच्छा) का प्रमाण भी है जिसने नई भूमि पर अपनी जड़ों को फिर से हरा-भरा किया 3।
  • हृदय में बसी संस्कृति: डॉ. लोढ़ा का मानना है कि संस्कृति केवल निर्जीव स्मारकों में नहीं, बल्कि मनुष्यों के हृदय में बसती है 1। जब तक समाज अपने इन उत्सवों को जीवित रखता है, उसकी ऐतिहासिक पहचान एक धड़कन की तरह चलती रहती है 1।

संक्षेप में, 'इतिहास की धड़कन' उस अखंड सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है जो विस्थापन जैसी त्रासदियों के बाद भी समुदाय के आत्मगौरव और एकता को जीवित रखे हुए है 1, 3।




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