Pratidin Ek Kavita

Kona | Priya Johri 'Muktipriya'


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कोना । प्रिया जोहरी 'मुक्तिप्रिया’


वो

कोना था

मेरे जीवन का,

एक गहरा,

सकरा,

फिर भी विस्तृत-

इतना कि उसमें

पूरा जीवन समा जाए।

समा जाएँ

मेरी हर तकलीफ,

हर रंज,

हर तंज।

उस कोने में बैठकर

लिख सकती हूँ

अनगिनत प्रेम-पत्र,

पढ़ सकती हूँ


मन की दो किताबें,

तोड़ सकती हूँ


कई गुलाब,


और गूँथ सकती हूँ

एक फूलों की माला।

महसूस कर सकती हूँ

नदी का तेज,

ताज़ी हवा का हर झोंका।

देख सकती हूँ.

हथेली पर रखा

एक सफेद मोती,

जो किसी चमत्कार सा

चमकता है।

सजा सकती हूँ

बालों में

गुलमोहर की लट,

महक सकती हूँ

एक अनछुई

खुशबू सी।

खिल सकती हूँ

यूँ जैसे

अभी-अभी

कोई ताज़ा कमल

खिला हो।

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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio