दिसंबर 2020 में, इंसानी इतिहास में पहली बार, रिसर्चर्स ने ये रिपोर्ट दी कि उन्हें कई स्वस्थ महिलाओं के प्लेसेन्टा यानी गर्भनाल में माइक्रोप्लास्टिक के पार्टिकल्स मिले हैं। इससे ये दिखता है कि अगर हम हर रोज़ प्लास्टिक खाने और सांस के साथ अंदर लेने लगें तो क्या होगा। अगर हम प्लास्टिक पर इतना ज़्यादा डिपेंड होने की अपनी आदत नहीं छोड़ते, तो हमारी अगली पीढ़ियां सिर्फ़ इंसानी सेल्स से बनी नहीं रह जाएंगी। बल्कि ये बायोलॉजिकल और इनऑर्गैनिक चीज़ों का मिक्स्चर होंगी, जैसे साइबोर्ग्स।
लेकिन हम प्लास्टिक खाते तो नहीं, तो ये हमारी बॉडीज़ के अंदर कैसे आ रही है? आपकी बॉडी प्लास्टिक पर कैसे रिएक्ट करती है? क्या आप प्लास्टिक को अपनी बॉडी से बाहर निकाल सकते हैं?
क्या हो अगर, छोटी डॉक्यूमेंट्रीज़ की एक सीरीज है जो आपको काल्पनिक दुनिया और संभावनाओं के एक दिलचस्प सफ़र पर ले जाती है। आइये, इस काल्पनिक रोमांच पर हमारे साथ चलिए जहाँ उम्मीद है कि हम आपको दुनिया की मुश्किल चीज़ों और घटनाओं को आसान और मज़ेदार तरीक़े से बयान कर सकेंगे।
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