
Sign up to save your podcasts
Or


छाती पर लिखी गई समकालीन कहानी
गुरुघासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर में वाचाल कुलपति द्वारा प्रमुख हिंदी कहानीकारों में से एक मनोज रूपड़ा को मिले अपमानजनक सभा निकाला घटनाक्रम पर प्रस्तुत है संगीत साधक और साहित्यकार डॉ रामकुमार सिंह की फ़ेसबुक कविता पोस्ट। हिंदी शिक्षक रहे डॉ रामकुमार सिंह इन दिनों अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर के केंद्रीय विद्यालय में प्राचार्य हैं।
सभा से निकाले जाने के बाद
लेखक बाहर नहीं गया—
वह बस कहानी में चला गया।
उसने देखा, कुलपति मंच नहीं थे,
वो एक विशाल छाती बन चुके थे—
फूली हुई, भाषणों से तनी हुई,
और आत्मसम्मान के बटन से बंद।
तभी एक लेखक चढ़ा,
फिर दूसरा,
फिर तीसरा—
कोई जूते उतारकर,
कोई पेन निकालकर।
“अरे! यह क्या कर रहे हो?”
छाती ने गुर्राकर पूछा।
लेखकों ने कहा—
“घबराइए नहीं महोदय,
यह समकालीन कहानी है—
इसे पढ़ा नहीं जाता,
लिखा जाता है…
वह भी वहीं,
जहाँ सबसे ज़्यादा दबाव होता है।”
एक ने पसलियों के बीच
नायक रख दिया—
जो सुनना चाहता है।
दूसरे ने दिल के पास
एक संवाद चिपकाया—
“बोरियत सत्ता की बीमारी है।”
तीसरे ने फेफड़ों पर
हाशिए के लोग बसा दिए—
ताकि हर साँस में
लोकतंत्र घुले।
छाती हाँफने लगी।
उस पर कहानी फैलती गई—
बिना अनुमति,
बिना अध्यक्षीय स्वीकृति।
कुलपति बोले—
“यह अनुशासनहीनता है!”
लेखक हँसे—
“जी हाँ,
इसी अनुशासनहीनता से
साहित्य पैदा होता है।”
सभा तालियों से नहीं,
खामोशी से भर गई—
क्योंकि पहली बार
कहानी मंच पर नहीं,
छाती पर लिखी जा रही थी।
और जब सब उतर गए,
छाती पर पंक्ति रह गईं—
“जो लेखक को बाहर करता है,
वह अंततः कहानी के भीतर चला जाता है।
कहानीकार सभा निकाला के बाद
लेखक बिरादरी में सच्चा सम्मान पाता है।"
०००
By Shashi Bhooshanछाती पर लिखी गई समकालीन कहानी
गुरुघासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर में वाचाल कुलपति द्वारा प्रमुख हिंदी कहानीकारों में से एक मनोज रूपड़ा को मिले अपमानजनक सभा निकाला घटनाक्रम पर प्रस्तुत है संगीत साधक और साहित्यकार डॉ रामकुमार सिंह की फ़ेसबुक कविता पोस्ट। हिंदी शिक्षक रहे डॉ रामकुमार सिंह इन दिनों अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर के केंद्रीय विद्यालय में प्राचार्य हैं।
सभा से निकाले जाने के बाद
लेखक बाहर नहीं गया—
वह बस कहानी में चला गया।
उसने देखा, कुलपति मंच नहीं थे,
वो एक विशाल छाती बन चुके थे—
फूली हुई, भाषणों से तनी हुई,
और आत्मसम्मान के बटन से बंद।
तभी एक लेखक चढ़ा,
फिर दूसरा,
फिर तीसरा—
कोई जूते उतारकर,
कोई पेन निकालकर।
“अरे! यह क्या कर रहे हो?”
छाती ने गुर्राकर पूछा।
लेखकों ने कहा—
“घबराइए नहीं महोदय,
यह समकालीन कहानी है—
इसे पढ़ा नहीं जाता,
लिखा जाता है…
वह भी वहीं,
जहाँ सबसे ज़्यादा दबाव होता है।”
एक ने पसलियों के बीच
नायक रख दिया—
जो सुनना चाहता है।
दूसरे ने दिल के पास
एक संवाद चिपकाया—
“बोरियत सत्ता की बीमारी है।”
तीसरे ने फेफड़ों पर
हाशिए के लोग बसा दिए—
ताकि हर साँस में
लोकतंत्र घुले।
छाती हाँफने लगी।
उस पर कहानी फैलती गई—
बिना अनुमति,
बिना अध्यक्षीय स्वीकृति।
कुलपति बोले—
“यह अनुशासनहीनता है!”
लेखक हँसे—
“जी हाँ,
इसी अनुशासनहीनता से
साहित्य पैदा होता है।”
सभा तालियों से नहीं,
खामोशी से भर गई—
क्योंकि पहली बार
कहानी मंच पर नहीं,
छाती पर लिखी जा रही थी।
और जब सब उतर गए,
छाती पर पंक्ति रह गईं—
“जो लेखक को बाहर करता है,
वह अंततः कहानी के भीतर चला जाता है।
कहानीकार सभा निकाला के बाद
लेखक बिरादरी में सच्चा सम्मान पाता है।"
०००