Pratidin Ek Kavita

Ma Atithi Hai | Kumar Ambuj


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माँ अतिथि है | कुमार अम्बुज


माँ घर में आई है लेकिन वह अतिथि है

उसके पास उसके हज़ारों बाक़ी रह गए काम हैं


उसके पास उसका अपना घर है

जिसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता सूना


जो भरा हुआ है बीते हुए समय से

माँ धीरे-धीरे चली गई है इतनी दूर


कि उसके सबसे स्मरणीय और चमकदार रूप के लिए

लौटना होता है कई साल पहले के वक़्त में


मैं चाहूँ तो भी नहीं रोक सकता माँ को जाने से

भूल चुका हूँ मैं हठ करना


दूर-दूर तक नहीं बची रह गई है मुझमें अबोधता

धीरे-धीरे मैं ख़ुद चला आया हूँ माँ से इतनी दूर


कि मेरे घर में अब

माँ एक अतिथि है।


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