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मैं गढ़ना चाहती हूँ | प्रिय जोहरी 'मुक्तिप्रिया'
मैं गढ़ना चाहती हूँ
एक पुरुष
जो जानता हो
एक स्त्री होना
क्या होता है।
जो जानता हो
गाँव छूटता है,
मां-बाप का बसाया
घर-संसार छूटता है,
तो क्या होता है।
जो जानता हो
कि
स्त्री की काया
संसार की माया नहीं,
जगत का सृजन है,
हर मानस का जन्म है।
जो जानता हो
किसी औरत का हौसला
बनाना कोई एहसान नहीं.
ईमान है उसका,
सच्चे पुरुष होने का
प्रमाण है उसका।
जो जी सकें जीवन को
सिर्फ़
एक मानव होकर,
बटे बिना,
किसी जेंडर की रेखा में
देख सके
स्त्री का समूचा संसार
मर्दवादी आहम और दंभ छोड़कर।
कभी दो वक्त सोचे
क्यों सीता को ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ी,
क्यों द्वौपदी का ही चीर हरण होता है,
क्यों किसी भी औरत के चरित्र को
बिगाड़ देना इतना आसान होता है।
खिला सके
दो निवाले
प्रेम और करुणा से
अपनी संतान को,
कर सके घर के काम
पका सके दो वक्त की रोटी.
कभी जाए और जलाएं अपने तन को
चूल्हे की आंच में,
काटे अपने हाथ चाकू की धार से
निकल कर देखे कि बाज़ार में क्या-क्या
कहाँ मिलता है,
घर के किस कोने
डिब्बे में क्या-क्या रखा है
किस गमले में कौन सा फूल
खिलता है.
कब, किस तारीख को
एकादशी का व्रत अता है।
जो समझे कि
प्रेम का सम्मान
और रज़ामंदी के साथ होना
कितना ज़रूरी है,
जो स्त्री को कोई पब्लिक असेट
नहीं मानता हो
जो मानता हो
यह दुनिया
स्वर्ग से सुंदर होगी
जब मेरे होने
और मेरी माँ के होने,
और मेरी बहन के होने
और मेरी जीवन साथी के होने में
कोई अंतर नहीं होगा।
काश, ऐसा गढ़ा पुरुष समझ पाए
कि एक स्त्री होना क्या होता है,
बस एक स्त्री होना क्या होता है।
By Nayi Dhara Radioमैं गढ़ना चाहती हूँ | प्रिय जोहरी 'मुक्तिप्रिया'
मैं गढ़ना चाहती हूँ
एक पुरुष
जो जानता हो
एक स्त्री होना
क्या होता है।
जो जानता हो
गाँव छूटता है,
मां-बाप का बसाया
घर-संसार छूटता है,
तो क्या होता है।
जो जानता हो
कि
स्त्री की काया
संसार की माया नहीं,
जगत का सृजन है,
हर मानस का जन्म है।
जो जानता हो
किसी औरत का हौसला
बनाना कोई एहसान नहीं.
ईमान है उसका,
सच्चे पुरुष होने का
प्रमाण है उसका।
जो जी सकें जीवन को
सिर्फ़
एक मानव होकर,
बटे बिना,
किसी जेंडर की रेखा में
देख सके
स्त्री का समूचा संसार
मर्दवादी आहम और दंभ छोड़कर।
कभी दो वक्त सोचे
क्यों सीता को ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ी,
क्यों द्वौपदी का ही चीर हरण होता है,
क्यों किसी भी औरत के चरित्र को
बिगाड़ देना इतना आसान होता है।
खिला सके
दो निवाले
प्रेम और करुणा से
अपनी संतान को,
कर सके घर के काम
पका सके दो वक्त की रोटी.
कभी जाए और जलाएं अपने तन को
चूल्हे की आंच में,
काटे अपने हाथ चाकू की धार से
निकल कर देखे कि बाज़ार में क्या-क्या
कहाँ मिलता है,
घर के किस कोने
डिब्बे में क्या-क्या रखा है
किस गमले में कौन सा फूल
खिलता है.
कब, किस तारीख को
एकादशी का व्रत अता है।
जो समझे कि
प्रेम का सम्मान
और रज़ामंदी के साथ होना
कितना ज़रूरी है,
जो स्त्री को कोई पब्लिक असेट
नहीं मानता हो
जो मानता हो
यह दुनिया
स्वर्ग से सुंदर होगी
जब मेरे होने
और मेरी माँ के होने,
और मेरी बहन के होने
और मेरी जीवन साथी के होने में
कोई अंतर नहीं होगा।
काश, ऐसा गढ़ा पुरुष समझ पाए
कि एक स्त्री होना क्या होता है,
बस एक स्त्री होना क्या होता है।