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नदी... जिसे हम माँ कहते हैं। नदी... जो जीवन देती है, खेतों को सींचती है, बच्चों को खिलखिलाने का कारण देती है। नदी शब्द बोलते ही एक स्वच्छ, शांत और कल-कल करती हुई बहती हुई तस्वीर मन में आ जाती है। मगर जब रेडियो सबरंग की टीम हिंडन नदी के छठ घाट पहुँची तो वहाँ था सिर्फ़ चीखता हुआ सन्नाटा और उस नदी की पीड़ा। चारों तरफ फैला कचरा — प्लास्टिक की थैलियाँ, टूटी हुई मूर्तियाँ, गंदे कपड़े, सड़ी हुई फूल मालाएं और अपनी कोशिशों से इन सब को हिंडन नदी से बाहर निकालते हुए इस नदी की पीड़ा को कम करते हुए पर्यावरण प्रहरी मयंक चौधरी। स्वाति चौहान ने मयंक से पूछा उनके 60 दिनों के चैलेंज के बारे में-
By Radio Sabrangनदी... जिसे हम माँ कहते हैं। नदी... जो जीवन देती है, खेतों को सींचती है, बच्चों को खिलखिलाने का कारण देती है। नदी शब्द बोलते ही एक स्वच्छ, शांत और कल-कल करती हुई बहती हुई तस्वीर मन में आ जाती है। मगर जब रेडियो सबरंग की टीम हिंडन नदी के छठ घाट पहुँची तो वहाँ था सिर्फ़ चीखता हुआ सन्नाटा और उस नदी की पीड़ा। चारों तरफ फैला कचरा — प्लास्टिक की थैलियाँ, टूटी हुई मूर्तियाँ, गंदे कपड़े, सड़ी हुई फूल मालाएं और अपनी कोशिशों से इन सब को हिंडन नदी से बाहर निकालते हुए इस नदी की पीड़ा को कम करते हुए पर्यावरण प्रहरी मयंक चौधरी। स्वाति चौहान ने मयंक से पूछा उनके 60 दिनों के चैलेंज के बारे में-