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मिलन । भारतभूषण अग्रवाल
छलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान,
मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान;
ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक -
इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण।
By Nayi Dhara Radioमिलन । भारतभूषण अग्रवाल
छलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान,
मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान;
ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक -
इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण।