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सुबह आँख खुलने से लेकर रात में सोने तक मोबाइल फ़ोन हमारी ज़िंदग़ी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कभी अपना काम, कभी सोशल मीडिया पर रील्स देखने में लगता समय तो कभी बच्चों का काम। हम काफ़ी समय मोबाइल देखने में लगा रहे हैं। मगर ये आदत कब धीरे-धीरे मोबाइल के एडिक्शन में बदल जाए ये समझना बेहद ज़रूरी है। इसी बारे में रेडियो सबरंग की अनुराधा श्रीवास्तव ने बात की डॉक्टर वंदना प्रकाश से-
By Radio Sabrangसुबह आँख खुलने से लेकर रात में सोने तक मोबाइल फ़ोन हमारी ज़िंदग़ी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कभी अपना काम, कभी सोशल मीडिया पर रील्स देखने में लगता समय तो कभी बच्चों का काम। हम काफ़ी समय मोबाइल देखने में लगा रहे हैं। मगर ये आदत कब धीरे-धीरे मोबाइल के एडिक्शन में बदल जाए ये समझना बेहद ज़रूरी है। इसी बारे में रेडियो सबरंग की अनुराधा श्रीवास्तव ने बात की डॉक्टर वंदना प्रकाश से-