कविता: ठण्ड से नहीं मरते शब्द | कवि: केदारनाथ सिंह | स्वर: आदर्श भूषण
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जब हम नहीं बीत रहे होते तब बीत रहा होता है बहुत कुछ। जब हम बीत रहे होते हैं तब तक बहुत कुछ बीत चुका होता है। हमारे होने से पहले और हमारे होने के बाद जो भी बीतने के दौर में शामिल है और होता जाएगा, कविताएँ उनसे पूरा जीवन नहीं माँगेंगी लेकिन माँगेंगी पूरी आत्मा का धैर्य। यहाँ ऐसी ही कुछ कविताएँ हैं जो मेरी आवाज़ के ज़रिए आप तक पहुँचाने की कोशिश है। कुछ लम्बा चौड़ा हिसाब किताब नहीं है कविताओं के आगे पीछे बस एक आवाज़ है और एक कविता।
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